मल्टीमीडिया डेस्क। आईपीसी की धारा-377 के तहत, अगर कोई व्यक्ति किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाता है, तो उसे उम्रकैद या जुर्माने के साथ दस साल तक की जेल की सजा हो सकती है। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है। आईपीसी की ये धारा लगभग 150 साल पुरानी है, जिसे लॉर्ड मैकाले ने भारत में लागू किया था। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट 6 सितंबर 2018 को अपना फैसला दे सकती है। जानते हैं इस धारा के बारे में सब कुछ...

वर्तमान स्थिति क्या है

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन, जस्टिस एएम कनविलकर, जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ कर रही है। इससे पहले 9 जजों की बेंच निजता के अधिकार को मूल अधिकार करार दे चुकी है। अब इन पांच जजों की बेंच देखेगी कि क्या मौलिक अधिकार और जीवन जीने के अधिकार में यौन स्वतंत्रता भी शामिल है। आईपीसी की धारा-377 को असंवैधानिक करार दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन पर बीती 10 जुलाई से सुनवाई चल रही है।

कैसे संज्ञान में आई धारा-377

सबसे पहले साल 1290 में इंग्लैंड के फ्लेटा में अप्राकृतिक संबंध बनाने का मामला सामने आया था। इसके बाद पहली बार कानून बनाकर इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया। बाद में ब्रिटेन और इंग्लैंड में 1533 में बगरी (अप्राकृतिक संबंध) एक्ट बनाया गया और इसके तहत फांसी का प्रावधान किया गया। 1563 में क्वीन एलिजाबेथ-1 ने इसे फिर से लागू कराया। 1817 में बगरी एक्ट से ओरल सेक्स को हटा दिया गया और 1861 में मृत्यु दंड का प्रावधान भी हटा दिया गया। भारत में साल 1861 में लॉर्ड मेकाले ने इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) का मसौदा तैयार करके धारा-377 का प्रावधान लागू किया था।

क्या है LGBTQ समुदाय

LGBTQ समुदाय के तहत लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंटर और क्वीयर आते हैं। इस समुदाय के लोगों की मांग है कि उन्हें उनका हक दिया जाए और धारा 377 को अवैध ठहराया जाए। निजता का अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस समुदाय ने अपनी मांगों को फिर से तेज कर दिया था।

बताते चलें कि अब तक ऑस्ट्रेलिया, माल्टा, जर्मनी, फिनलैंड, कोलंबिया, आयरलैंड, अमेरिका, ग्रीनलैंड, स्कॉटलैंड, लक्जमबर्ग, इंग्लैंड और वेल्स, ब्राजील, फ्रांस, न्यूजीलैंड, उरुग्वे, डेनमार्क, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड जैसे 26 देशों ने समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है।

अब तक क्या हुआ है

भारत में सबसे पहले जुलाई 2009, में दिल्ली हाई कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को गैर-कानूनी करार दिया। 'नाज फाउंडेशन' की तरफ से दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने धारा 377 को संविधान की धारा 14, 15 और 21 का उल्लंघन बताया।

दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बदल दिया और 377 के खिलाफ दिए गए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को ‘कानूनी तौर से लागू’ नहीं हो पाने वाला फैसला करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार चाहे, तो इस धारा को खत्म करने या बदलने के लिए संसद में कानून बना सकती है।

साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए समलैंगिक संबंधों को अवैध ठहराया। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ 'नाज फाउंडेशन' ने पुनर्विचार याचिका दायर की गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

साल 2014 में बनी मोदी सरकार ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की धारा 377 पर कोई फैसला लेगी। एनसीआरबी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धारा 377 के तहत हुए अपराधों के आंकड़ों को पहली बार एकत्र करना शुरू किया।

साल 2016 में एस जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, शेफ रितु डालमिया, होटल बिजनेसमैन अमन नाथ और बिजनेस एक्जीक्यूटिव आयशा कपूर ने धारा 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका दायर करने वाले सभी लोग जाने-माने समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले और खुद 377 के तहत प्रभावित लोग हैं। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा है कि यह संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के विभिन्न प्रावधानों के खिलाफ है।

2017 में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने धारा 377 में बदलाव के लिए भारतीय दंड संहिता (संशोधन) विधेयक पेश किया था। हालांकि, वह लोकसभा में पास नहीं हो पाया। अगस्त, 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘निजता के अधिकार’ पर दिए गए फैसले में सेक्स-संबंधी झुकावों को मौलिक अधिकार माना और यह भी चिह्नित किया कि ‘किसी भी व्यक्ति के सेक्स संबंधी झुकाव उसके राइट टू प्राइवेसी का मूलभूत अंग’ है।

8 जनवरी, 2018 को चीफ जस्टिस की नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय बेंच ने समलैंगिक सेक्स को अपराध से बाहर रखने के लिए दायर अर्जी संविधान पीठ को सौंप दी। साथ ही केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर जवाब देने को कहा।

9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 377 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 10 जुलाई से सुनवाई होगी। इस मामले में सुनवाई कुछ समय के लिए स्थगित करने से वाली केंद्र की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया है। बता दें कि केंद्र ने सुनवाई स्थगित करने की मांग की थी और कुछ और समय मांगा था।