मल्टीमीडिया डेस्क। खौफ, डर, आशंका और अनजानी आहट के साये में लिपटी फिरंगी राज की उपनिवेशकालीन राजधानी कलकत्ता की 16 अगस्त 1946 की सुबह सामान्य दिनों की तरह थी, लेकिन कलकत्ता के बंगाली भद्रजन एक अनजाने भय से खौफजदा थे। क्योंकि मुस्लिम लीग ने अब पाकिस्तान के लिए एक तरह से जंग लड़ने का फैसला कर लिया था और इसके लिए उसके नेताओं ने इस दिन को चुन कर प्रत्यक्ष कार्रवाई करने का एलान कर दिया था।

कलकत्ता की सड़कों पर खेला गया खूनी खेल

उस वक्त बंगाल के गर्वनर थे फ्रेडरिक वरोज और जनता की नुमाइंदगी कर रहे थे बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के वजीरे आजम हस्सनान शदीद सुहरावर्दी। इस दिन बंगाल में छुट्टी की घोषणा कर दी गई थी। हिंदू धनाढयों की सूची बकायदा तैयार कर ली गई थी। मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता गाड़ियों और पैदल सैकड़ों, हजारों के झुंड में सड़कों पर उतर आए। थोड़ी ही देर में पाकिस्तान जिंदाबाद, जिन्ना जिंदाबाद, मुस्लिग लीग जिंदाबाद के नारे बुलंद होने लगे और कलकत्ता की सड़कों पर खूनी खेल शुरू हो गया। जकरिया स्ट्रीट में कारोबारियों को मारकर दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। उसके बाद मंदिर गली, हरिसन रोड, मझुआ बाजार, राजा बाजार, कार्नवालिस स्ट्रीट, रीपन कॉलेज, खिदरपुर, बेलिया घाट में मौत का तांडव मचाया गया और देखते ही देखते पूरे शहर को जुनूनी जिहादियों ने अपने आगोश में ले लिया।

कॉलेज में सैकड़ों छात्र- छात्राओं का सामूहिक कत्ल किया गया। कई इमारतों में लोगों को कैद कर उनको आग के हवाले कर दिया गया, जिससे लोग अंदर ही जलकर मर गए। हजारों महिलाओं को मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने दुष्कर्म करने के बाद वहशी तरीके से कत्ल कर दिया। सिर्फ सरकारी आंकड़ों पर यकीन करें तो लीग के लोगों ने प्रत्यक्ष कार्यवाही के नाम पर 40 हजार लोगों को सिर्फ कलकत्ता में मौत के घाट उतार दिया था। जबकि हकीकत में मरने वाले बेगुनाह लोग इससे कई गुना ज्यादा थे। सती और जौहर प्रथा इतिहास की बातें हो चुकी थी, लेकिन नोआखली और दूसरे कई इलाकों में महिलाओं ने अपनी अस्मत बचाने के लिए जलते मकानों में कूदकर जान दे दी थी।

20 घंटे तक चला कलकत्ता में कत्लेआम

पूरे 20 घंटे तक कलकत्ता की सड़कों पर लीगी गुंडों का खूनी खेल बैखोफ चलता रहा, लेकिन इस दौरान ना तो धारा 144 लगाई गई ना ही कर्फ्यू के आदेश जारी किए गए, क्योंकि इन कातिलों का मसीहा खुद वजीरे आजम सुहरावर्दी था। उसकी शह पर ही कोलकाता की सड़को को खून से लाल कर दिया गया था। पुलिस को सख्त हिदायत दी गई थी कि किसी भी सूरत में गोली न चलाई जाए। सिर्फ टेलीफोन के द्वारा 2500 स्थानों पर कत्लेआम की सूचना पुलिस को दी गई, लेकिन कॉल अटेंड करने के बाद किसी ने इसको रोकने की जहमत नहीं उठाई। जब समाचार पत्रों में इस विभत्स हत्याकांड की खबरें आने लगी तो बंगाल की सुहरावर्दी सरकार ने अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया। उनके दफ्तरों की तलाशी ली गई और दंगे से संबंधित खबर छापने पर कार्रवाई की धमकी दी गई।

पूरे देश में फैल गई दंगे की आग

कत्लेआम के विरोध में विपक्ष के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉक्टर विधानचंद रॉय और किरणशंकर रॉय ने 16 अगस्त को ही वायसराय से मुलाकात कर तत्काल दंगे को रोकने के लिए कदम उठाने की मांग की। साथ ही जांच कमीशन बिठाने की मांग की। आखिर वायसराय ने दूसरे दिन यानी 15 अगस्त को कलकत्ता का दौरा किया और दंगे और कत्लेआम की आग में झुलसते शहर का जायजा लिया, लेकिन अब कलकत्ता से उठी सांप्रदायिक दंगों की चिंगारी ने मुल्क के ज्यादातर हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया था। हर कहीं सड़कों पर खून-खराबा होने लगा था। प्रत्यक्ष कार्यवाही और पाकिस्तान की मांग के इस जिहादी जुनून ने बलूचिस्तान से लेकर मद्रास तक को अपने खूनी आगोश में समा लिया था।

कलकत्ता के कत्लेआम के विरोध में शरतचंद बोस की अध्यक्षता में 4 नवंबर से 14 नवंबर 10 दिनों तक शहर का कारोबार बंद रखने का निर्णय किया गया। दंगों के संबंध मे फिरंगी लेफ्टिनेंट जनरल बूचर ने अपनी रिपोर्ट मे कहा कि दंगे पूर्वनियोजित थे और साजिश के तहत इनको अंजाम दिया गया, जिसमें सिर्फ कत्लेआम ही नहीं बल्कि धर्मपरिवर्तन और लूट जैसी तमाम वारदाते शामिल है। इसी समय नोआखली में नौत का नंगा नाच किया गया था और हजारों बेकसूरों को मार कर वहां की बड़ी आबादी को धर्मातरण के लिए मजबूर कर दिया गया था।

दंगे की आग ने कर दिया था मुल्क के विभाजन का फैसला

प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस ने सरदार पटेल जैसे राष्ट्रवादी नेताओं को भी अंदर तक झकझोर दिया था। क्योंकि जिस तरह से मुस्लिम लीग अपने नेताओं की शह पर अपने मंसूबों को अंजाम दे रही थी उससे देश के बड़े हिस्से में बहुसंख्यकों की दुश्वारियां बढ़ती जा रही थी। फिर लीग का उसी की भाषा में जवाब देने वाले लोग काफी कम थे और उदासीन और सुरक्षात्मक रवैया अख्तियार करने वाले ज्यादा थे। बस इसी एक दिन ने मुल्क की तकदीर का फैसला कर दिया और देश विभाजन के फैसले पर मुहर लग गई। रंजिशों में लिपटी तारीख ने तवारीख को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।

योगेंद्र शर्मा