नई दिल्ली। देश इस वक्त कोरोना महामारी से लड़ाई लड़ रहा है। रोजाना एक लाख से ज्यादा टेस्टिंग की जा रही हैं। फिर भी ये बेहद नाकाफी साबित हो रही हैं। इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा है कि कोरोना संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में देश की 1.3 अरब आबादी की टेस्टिंग करने की ना तो जरूरत है और न ही इतनी बड़ी जनसंख्या का कोविड-19 टेस्ट कर पाना संभव है। उन्होंने इस घातक संक्रमण का पता लगाने के लिए ज्यादा से ज्यादा टेस्ट कराने की रणनीति को भारत के लिए कारगर न मानते हुए कहा कि देश की मौजूदा टेस्टिंग रणनीति जरूरत के हिसाब से है। इस लिहाज से फिलहाल उन्हीं लोगों का परीक्षण किया जा रहा है जिनमें उसके लक्षण नजर आ रहे हैं या फिर उसे प्राथमिक रूप से अधिक खतरा है। हालांकि इसकी भी समय-समय पर बदलते हालात के अनुरूप समीक्षा की जा रही है।

टेस्टिंग के आंकड़े बताए

केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन ने गुरुवार को देश में हो रहे परीक्षणों का ब्यौरा देते हुए कहा कि 27 मई तक देश में रोजाना परीक्षण की क्षमता 1.60 लाख थी। जबकि 26 मई तक यही क्षमता प्रतिदिन के हिसाब से 1,15,229 परीक्षण हो चुके हैं। इसीलिए अब तक 32,44,884 परीक्षणों को अंजाम दिया जा चुका है।

उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा रणनीति जरूरत के मुताबिक टेस्ट करने की है। अगर हम लगातार 1.3 अरब लोगों के बार-बार टेस्ट करना चाहेंगे तो यह बेहद खर्चीला उपाय है बल्कि यह सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों में से एक देश के लिए संभव भी नहीं है। उन्होंने बताया कि पहले फरवरी तक पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) की एक प्रयोगशाला थी लेकिन अब देश में 435 सरकारी लैबों समेत कुल 624 लैब बन चुकी हैं।

0.3 फीसद दर से हुईं मौतें

निजी और सरकारी साझेदारी में सरकार आपात स्थिति का मुकाबला करने के लिए कोविड-19 की वैक्सीन तैयार करने में दिन रात जुटी हुई है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी की देखरेख में भारत सरकार ने वक्त रहते कुछ बड़े फैसले लिए इस वजह से अन्य देशों के मुकाबले यहां उस स्तर पर संक्रमण नहीं फैला है। भारत में फिलहाल हर एक लाख पर 0.3 फीसद की दर से ही मौतें हुई हैं। जबकि अमेरिका और चीन जैसे देशों में मौतों का आंकड़ा कहीं ज्यादा है।

तापमान का असर नहीं

उन्होंने कहा कि इस संक्रमण के फैसले से सर्दी-गर्मी का कोई लेना-देना नहीं है। हर तरह के मौसम वाले देशों में मौतों का आंकड़ा बढ़ता रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दिल्ली स्थित एम्स के निदेशक डॉ.रणदीप गुलारिया के कोविड-19 के पीक पर पहुंचने के आंकलन को भी खारिज करते हुए कहा कि इस महामारी की भावी स्थिति का आंकलन करना बेहद मुश्किल है। बहुत सारे अनुमानों पर आधारित गणितीय आंकलन सटीक नहीं हो सकते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत में कोरोना के 80 फीसद मामले एसिम्टोमैटिक यानी बहुत हल्के लक्षण वाले हैं। ऐसे मरीजों में या तो संक्रमण के लक्षण नजर ही नहीं आते हैं या फिर बेहद हल्के होते हैं। ऐसे मरीज ज्यादातर किसी संक्रमित मरीज के संपर्क में होते हैं जो किसी न किसी समय में उनके संपर्क में आए होते हैं।

Posted By: Neeraj Vyas

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