देहरादून। एक तो विषम भूगोल और उस पर नीति-नियंताओं की अनदेखी। नतीजा घटती उपजाऊ जमीन और बंजर होते खेत। उत्तराखंड के हालात तो कुछ ऐसे ही हैं। राज्य बने 15 साल होने को हैं, लेकिन कृषि की तकदीर संवारने की दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। खासकर पहाड़ के गांवों में स्थिति चिंताजनक है। आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हैं। राज्य गठन के बाद डेढ़ दशक में 1.14 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो गई है। इस भूमि पर कभी फसलें लहलहाया करती थीं।

उत्तराखंड की कृषि व्यवस्था पर नजर दौड़ाएं तो यहां कुल 53.48 लाख हेक्टेयर में से 8.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती हुआ करती थी। कृषि विभाग के 2013-14 के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो कृषि योग्य भूमि घटकर 7.01 लाख हेक्टेयर पर आ गई है। उस पर भूगोल इतना जटिल है कि वर्तमान में जिस भूमि में खेती हो रही है उसके 3.28 लाख हेक्टेयर में ही सिंचाई की सुविधा है। इसमें भी पर्वतीय क्षेत्र का हिस्सा महज 0.38 लाख हेक्टेयर बैठता है। राज्य बनने से अब तक जो 1.14 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि घटी है, उसमें पर्वतीय इलाकों का हिस्सा सबसे ज्यादा है।

इस पर विडंबना देखिये कि उत्तराखंड को बने डेढ़ दशक का समय होने को है, लेकिन आज तक यहां की सरकारें कृषि के लिए कोई ठोस पैमाना तय नहीं कर पाई हैं। पलायन के चलते पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं और जो गांव आबाद हैं, उनमें मौसम समेत विभिन्न कारणों के चलते खेती से गुजारे लायक भी उत्पादन नहीं मिल पाता। अर्थव्यवस्था आज भी मनीआर्डर पर टिकी है। अन्न का उत्पादन सिर्फ मैदानी क्षेत्रों तक ही सिमटा है, मगर वहां भी किसान को प्रोत्साहित करने की दिशा में ठोस पहल नजर नहीं आती।

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