राहुल शर्मा, जम्मू। देश से राज्य के विलय के बाद पहली बार कश्मीर महाकुंभ के लिए तैयार है। एक ओर जहां कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर राजनीति जारी है तो दूसरी ओर करीब तीन दशक पहले घाटी से विस्थापित हुए पंडित महाकुंभ को यादगार बनाने में जुटे हुए हैं। पिछली बार यह महाकुंभ ठीक 75 साल पहले 1941 में महाराजा हरि सिंह के शासनकाल में लगा था। उस दौरान इसके सफल आयोजन के लिए प्रशासन का पूरा सहयोग मिला था।

श्रीनगर से 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जिला गांदरबल के शादीपुर इलाके में स्थिति नारनबाग में झेलम और सिंध का संगम है। प्रयाग के नाम से प्रख्यात इस स्थल पर 14 जून को केवल एक दिन के लिए ही महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है। हालांकि इससे दो दिन पहले 12 जून को तुलमुला में क्षीर भवानी मेले का आयोजन भी किया जा रहा है।

एक ही सप्ताह में होने वाले इन दोनों धार्मिक सम्मेलन को लेकर कश्मीरी पंडित काफी उत्साहित हैं। मां क्षीर भवानी के दर्शन कर जहां पंडित समुदाय मां से राज्य की शांति व समृद्धि की कामना करेंगे वहीं प्रयाग महाकुंभ में संगम में शाही स्नान करने के बाद वे अपने पूर्वजों का कर्म कांड कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करेंगे। इतने वर्षों बाद क्षीर भवानी मेले और महाकुंभ के एक साथ आने पर पंडित समुदाय अभी से तैयारियों में जुट गया है।

कश्मीर विस्थापित सेल के नेता टीएन भट्ट ने बताया कि महापर्व में शामिल होने के लिए जम्मू-कश्मीर के अलावा केरल, गुजरात, पश्चिम बंगाल व दिल्ली से सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचेंगे। उनके ठहरने व खान-पान की व्यवस्था की जा रही है। इस काम में स्थानीय मुस्लिम भाइयों का भी पूरा सहयोग मिल रहा है। उन्होंने बताया कि इसके लिए प्रयाग धाम प्रबंधन कमेटी का गठन किया है। पर्यटन विभाग ने श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए अस्थायी शौचालय का निर्माण कर दिया है। संगम पर नाव भी मंगवा ली हैं। श्रद्धालुओं के रहने की व्यवस्था आसपास के इलाकों में सराय, स्कूलों इत्यादि में की जा रही है।

शिवलिंग रूप में विराजमान हैं भगवान शिव

नारनबाग में जिस जगह सिंध और झेलम नदियों का संगम है उसी स्थान पर छोटे से टापू पर चिनार का पेड़ लगा हुआ है। पेड़ के नीचे भगवान शिव शिवलिंग रूप में विराजमान हैं जहां कश्मीरी पंडित समुदाय पूजा-अर्चना करते हैं।

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