Vegetable Rates: कोरोना वायरस और लॉकडाउन का सबसे ज्यादा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ा है। करीब दो महीनों तक मंडिया बंद होने के कारण सब्जियां मंडियों तक नहीं पहुंच पाई और नजीता यह रहा कि देश भर में सब्जियों के थोक भाव में 60 फीसदी तक की कमी आ गई है। किसानों को तो उनकी मेहनत का फल नहीं मिला, लेकिन दाम कम होने का फायदा आम लोगों तक नहीं पहुंचा। कारण इस दौरान ज्यादातर सब्जियों की खुदरा कीमतें ऊपरी स्तर पर स्थिर रही हैं। मंडियों से मिली जानकारी के अनुसार, भरपूर उत्पादन, मांग में भारी कमी और कोरोना वायरस के कारण बाजार बंद रहने से सब्जियों के थोक भाव में यह गिरावट देखने में आई है।

5 रुपए के टमाटर के 40 रुपए

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, रविवार यानी 24 मई को महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा समेत कई राज्यों में टमाटर का थोक भाव 5 रुपये प्रति किलो के नीचे रहे। जबकि आम जनता के प्रति किलो 40 रुपए चुकाने पड़ रहे हैं।

वहीं प्याज का थोक भाव प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में 6 रुपये प्रति किलोग्राम से कम था। जबकि मध्यप्रदेश के इंदौर में लोगों को 30 रुपए से 40 रुपए प्रति किलो में प्याज खरीदना पड़ा। वहीं आलू का थोक भाव रविवार को 12-13 रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर पर स्थिर रहा। जबकि इसकी खुदरा कीमतें 40 रुपए किलो रही। देश में इन्हीं तीन सब्जियों की खपत सबसे ज्यादा होती है।

लॉकडाउन के दौरान भिंडी, शिमला मिर्च, करेला, लौकी, हरी मिर्च और धनिया के थोक भाव में भी खासी गिरावट दर्ज की गई। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के अनुसार, किसान लागत से कम दाम पर अपने उत्पाद बेचने को मजबूर हैं। मंडियां राज्यों के विषय में आती हैं। ऐसे में राज्यों को वे सभी कदम उठाने चाहिए, जिससे मंडियों में अबाधित कारोबार चलता रहे।

कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के अनुसार, होटल, रेस्टोरेंट और अन्य संस्थागत खरीदारों की तरफ से सब्जियों की थोक मांग नहीं के बराबर रही है। जहां तक खुदरा ग्राहकों का सवाल है, तो वे कोरोना संक्रमण के भय से पहले जितनी सब्जियां नहीं खरीद रहे हैं। उन्हें हर बार सब्जियों को धोना जटिल काम लग रहा है। और जहां घर-घर जाकर सब्जियां बेची जा रही हैं, वहां विक्रेत मनमानी कीमतें वसूल रहे हैं।

Posted By: Arvind Dubey

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