मल्‍टीमीडिया डेस्‍क। झुलसती गर्मी के बीच एक राहत भरी खबर है। जून के पहले सप्‍ताह में ही मानसून की दस्‍तक संभव है। चार जून से देश में मानसून की शुरुआत देखने को मिल सकती है। वेदर फोरकास्‍ट एजेंसी स्‍कायमेट के मौसम वैज्ञानिकों ने मंगलवार को एक कार्यशाला में यह जानकारी दी।

पूर्वानुमान के अनुसार महाराष्ट्र, विदर्भ, तमिलनाडु, कर्नाटक, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में इस बार औसत से भी कम मानसून रहेगा। वहीं, दिल्ली- एनसीआर, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और चंडीगढ़ में इस साल मानसून सामान्य हो सकता है।

स्काइमेट के एक मौसम वैज्ञानिक ने बताया कि 29 जून के आसपास दिल्ली-एनसीआर में मानसून का असर देखने को मिल सकता है।

इससे पहले इसी एजेंसी ने गत अप्रैल माह में इस बार के मानसून के सामान्‍य रहने का अनुमान व्‍यक्‍त किया था।

ताजा अनुमान कहता है कि आगामी 4 जून से सितंबर के बीच इस बार मानसून रहेगा, जो कि सामान्‍य स्‍तर का रह सकता है। वर्ष 2019 में मानसून का एलपीए करीब 93 फीसदी दर्ज किया जाने की संभावना है।

इस मानसून सीजन के दौरान पिछले 50 सालों के औसत 89 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा होने को सामान्य बारिश कहा जाता है। यह 96 से 104 प्रतिशत के बीच होता है।

अप्रैल में आई रिपोर्ट में यह कहा गया था

गत अप्रैल में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने कहा था कि अल नीनो की स्थिति अभी तक बनी हुई है, लेकिन भारत के बारिश के मौसम में आगे बढ़ने पर उसके कमजोर होने की संभावना है।

मौसम विभाग ने यह भी कहा था कि आमतौर पर अल नीनो सामान्य से कम बारिश से जुड़ा होता है। बताते चलें कि भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून से होने वाली बारिश देश के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इस मानसून से होने वाली बारिश देश के आधे से अधिक खेतों को सिंचाई के लिए पानी मुहैया कराता है।

2019 के मानसून का यह था अनुमान

मौसम विभाग का अनुमान था कि जून-सितंबर के दौरान औसत बारिश 96 प्रतिशत रहने की संभावना है। पूर्वानुमान में पांच फीसद की त्रुटि हो सकती है।

इसलिए है भारत के लिए अहम

भारत की कृषि के लिए मानसून बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश की वार्षिक वर्षा के 70 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार है। इस मौसम में होने वाली बारिश से जलाशय भरते हैं, जो फसलों की सिंचाई में मददगार होते हैं। बारिश पर ही देश के लाखों लोगों की आजीविका टिकी रहती है और देश में यह खाद्य कीमतों को प्रभावित करती है।

मानसून कम-अधिक रहने का यह होता है असर

दुनिया में चावल, गेहूं और कपास के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश में बारिश कम होने का सीधा असर फसल के उत्पादन पर होता है। कम बारिश होने पर फसलों का उत्पादन कम होता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ जाती है और तेलों जैसी वस्तुओं का अधिक आयात करना पड़ता है।

Posted By: Navodit Saktawat

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