West Bengal: ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) भले ही नंदीग्राम सीट से चुनाव हार गईं, लेकिन उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन किया और अब दीदी सत्ता की तीसरी पारी शुरू करने जा रही हैं। तय कार्यक्रम के मुताबिक Mamata Banerjee 5 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगी। राज्यपाल जगदीप धनगड़ उन्हें शपथ दिलाएंगे। इस बीच, एक सवाल कई लोगों के जेहन में उठ रहा है कि क्या चुनाव में हार चुका नेता मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकता है? संविधान में इसको लेकर क्या प्रावधान हैं? वैसे देश में पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है। उत्तर प्रदेश का ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। जानिए इस मुद्दे पर क्या हैं कि संविधान का प्रावधान और क्या था सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला

राज्य में मुख्यमंत्री या मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर संविधान के आर्टिकल 164 में व्यवस्था दी गई है। इसके मुताबिक, हार के बाद भी नेता मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकता है और उसके पास चुनाव लड़कर विधायक बनने के लिए छह माह का समय रहता है। इसी कानून की धारा में व्यवस्था दी गई है कि राज्यपाल ही मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाएंगे। इसके बाद मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों का चयन करेंगे, फिर उनका शपथ ग्रहण होगा।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था उत्तर प्रदेश का मामला

1971 में उत्तर प्रदेश का ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। तब त्रिभुवन नारायण सिंह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। उस समय तक त्रिभुवन नारायण सिंह विधानसभा सदस्य नहीं थे। कांग्रेस ने तय किया था कि उनके लिए उपचुनाव करवाया जाएगा और जीतकर वे विधानसभा में आ जाएंगे। त्रिभुवन नारायण सिंह के शपथ ग्रहण के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर हुई, जिसे खारिज कर दिया गया। तब हाई कोर्ट ने कहा था कि आर्टिकल 164 की धारा (1) के अनुसार, कोई भी शख्स छह माह तक विधानसभा का सदस्य बने बगैर मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकता है। मामला सुप्रीम कोर्ट और फिर संवैधानिक बेंच के पास गया और हाई कोर्ट का फैसला बहाल रहा।

यह जानकारी भी कम दिलचस्प नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद त्रिभुवन नारायण सिंह ने उपचुनाव लड़ा। आपसी फूट के बीच कांग्रेस ने उनके लिए गोरखपुर की मणिराम सीट चुनी। त्रिभुवन नारायण सिंह को सभी बड़े नेताओं का समर्थन था, सिवाय इंदिरा गांधी के। इंदिरा ने त्रिभुवन नारायण सिंह के सामने अपने प्रत्याशी रामकृष्ण द्विवेदी को उतारा और चुनाव प्रचार किया। परिणाम वो रहा जिसने पूरे देश को हैरत में डाल दिया। मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके नेता को यहां हार का सामना करना पड़ा। त्रिभुवन नारायण सिंह देश के पहले मुख्यमंत्री रहे जिन्हें उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा। दूसरी बार ऐसा शिबू सोरोने के साथ हुआ है।

ममता बनर्जी की हैट्रिक की राह आसान

कुल मिलाकर ममता बनर्जी के उपचुनाव में जीतकर विधानसभा में आना कोई मुश्किल काम नहीं होगा। पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों में से 2 पर दोबारा चुनाव होना है। कारण चुनाव प्रचार के दौरान मुर्शिदाबाद की समसेरगंज सीट से कांग्रेस प्रत्याशी रिजाउल हक और खरदाहा से टीएमसी प्रत्याशी काजल सिन्हा की कोरोना से मौत हो चुकी है। इन सीटों पर उपचुनाव होना है। टीएमसी की योजना है कि ममता बनर्जी को किसी भी एक सीट से प्रत्याशी बनाकर चुनाव में जीत दिलाई जाए और विधानसभा पहुंचा दिया जाए।

Posted By: Arvind Dubey

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