नई दिल्ली। भारत के बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान बना, तब ऐसे-ऐसे समझौते हो गए कि आज वे घोर अव्यावहारिक और भारत विरोधी लगते हैं। ऐसा ही एक समझौता सिंधु नदी के जल को लेकर था। इस समझौते में भारत ने जब सिंधु का पानी रोकने की बात की, तो विश्व बैंक ने मध्यस्थता कर विवाद सुलझाने का बीड़ा उठा लिया। इसमें विश्व बैंक ने उल्टे भारत को यह कह दिया कि वह पाकिस्तान को पानी की व्यवस्था करने के लिए पैसा दे। आश्चर्य की बात कि इस भारत विरोधी शर्त को हमारे देश के तत्कालीन नेताओं ने मान भी लिया।

किस्सा 1959 का है। 1947 में बंटवारे के बाद से पाकिस्तान किसी न किसी बात को लेकर भारत से भिड़ता रहता था। इसे लेकर भारत ने कुछ सख्ती दिखाई और भारत से बहकर पाकिस्तान जाने वाली नदियों का पानी रोकने की बात कही। इसे लेकर पाकिस्तान की सरकार उखड़ गई। दोनों देशों में विवाद उठा तो विश्व बैंक ने मध्यस्थता

का प्रस्ताव दिया, जिसे दोनों देशों ने मान लिया।

विश्व बैंक के तत्कालीन सीईओ यूजिन ब्लेक ने पहला प्रस्ताव दिया, जिसेपाकिस्तान ने सिरे से खारिज कर दिया। आश्चर्य यह कि इस पर ब्लेक ने पाकिस्तान पर कोई दबाव न बनाते हुए दूसरा प्रस्ताव तैयार कर दिया। यह प्रस्ताव भारत के विरोध में था, जबकि इससे पाकिस्तान को बहुत लाभ हो रहा था। पाक इसे मानने को झट तैयार हो गया, लेकिन दुर्भाग्य से भारत ने इस पर बहुत ज्यादा आपत्ति नहीं जताई। इस प्रस्ताव में पाकिस्तान को पानी की व्यवस्था करने के लिए भारत सहित अन्य मित्र राष्ट्रों द्वारा भारी आर्थिक सहायता दिए जाने की बात थी।

भारत ने इस पर पुरजोर ढंग से विरोध जताने के बजाय छुटपुट विरोध जताया और यूजिन ब्लेक ने जो राशि तय

की थी, उसमें कुछ कटौती करते हुए पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने की बात मान ली। यह राशि भी विदेशी मुद्रा में देनी थी, जबकि तब भारत के स्वयं के पास विदेशी मुद्रा पर्याप्त नहीं थी। इस पूरे प्रकरण में भारत ने चौतरफा नुकसान झेला। अव्वल तो सिंधु नदी का पानी तब पर्याप्त ढंग से रोका ही नहीं गया, उल्टे पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा के स्वरूप में आर्थिक सहायता देनी पड़ गई। इस फैसले से तब भारत की दुनियाभर में एक कमजोर राष्ट्र की छवि बनी थी।

Posted By: Arvind Dubey