स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जब जवाहरलाल नेहरू ने शपथ ली थी, उसके कहीं पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ले चुके थे। बोस ने यह शपथ 21 अक्टूबर 1943 को उस समय ली थी, जब उन्होंने भारत को आजाद करवाने के लिए गठित की गई 'आजाद हिंद फौज" के मंत्रीमंडल का गठन किया था। नेताजी ने न सिर्फ प्रधानमंत्री बल्कि राज्य-प्रमुख, युद्ध-मंत्री तथा वैदेशिक मामलों के मंत्री का कार्यभार भी स्वयं के कंधों पर लिया था। शपथ लेते समय नेताजी एक स्वतंत्र भारत की कल्पना करते हुए भावुक हुए और रो दिए थे। उनकी करुणा देखकर वहां उपस्थित हर भारतीय की आंखों से आंसू बह निकले। ये आंसू दु:ख के नहीं बल्कि भारत को आजाद देखने की खुशी में थे। बाद में नेताजी के मंत्रीमंडल के अन्य सदस्यों ने बारी-बारी शपथ ली थी।

दरअसल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस का मानना था कि भारतीय इस बात की प्रतीक्षा क्यों करें कि जब अंग्रेज भारत को स्वतंत्रता देंगे, तब हम हमारी सरकार बनाकर देश की गतिविधियों का संचालन करें। इसी तर्क के साथ नेताजी ने पहले ही सरकार गठित कर शपथ ले ली थी। नेताजी का मानना था कि जब तक राज्य-सत्ता की ताकत हासिल नहीं की जाएगी, तब तक भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र करवा पाना आसान नहीं होगा। यही वजह थी कि उन्होंने अलग सेना के गठन के साथ-साथ अलग मंत्री समूह भी बनाया था। उनके मंत्री समूह में 18 मंत्री थे और इन सबको अलग-अलग विभागों का दायित्व सौंपा गया था।

यह शपथ समारोह सिंगापुर में हुआ था, जिसमें नेताजी ने कहा था 'यह शपथ उन शहीदों के नाम पर है, जिन्होंने हमें वीरता और बलिदान की अमर धरोहर दी। ईश्वर को साक्षी मानकर मैं सुभाषचंद्र बोस पवित्र शपथ लेता हूं कि अपने भारत व मेरे अड़तीस करोड़ देशवासियों (तब भारत की जनसंख्या) की स्वाधीनता के लिए अपनी अंतिम सांस तक स्वतंत्रता का पावन युद्ध लड़ता रहूंगा।" नेताजी के बाद अन्य सदस्यों ने भी अंतिम सांस तक भारत को स्वाधीन करने के संकल्प की शपथ ली व अंत में हाथों में बंदूक उठाकर भारत मां का जयकारा लगाया।

(श्रीकृष्ण सरल लिखित 'कालजयी सुभाष" से साभार)

Posted By: Arvind Dubey

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