नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित आधार कानून की संवैधानिक वैधता का परीक्षण करने का फैसला किया है। संशोधित कानून में निजी कंपनियों को बैंक खाता खोलने तथा मोबाइल फोन कनेक्शन के लिए 12 अंकों वाले आधार डेटा का इस्तेमाल ग्राहकों की पहचान के लिए बतौर सबूत करने की अनुमति दी गई है। प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे तथा जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने इस संबंध में दाखिल एक नई जनहित याचिका पर शुक्रवार को केंद्र तथा भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) नोटिस जारी किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि संशोधित कानून तथा नियमन नागरिकों के निजता समेत अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की एक संविधान पीठ ने 4:1 से बहुमत के फैसले में कुछ चेतावनियों के साथ केंद्र के आधार कानून को 'संवैधानिक" करार दिया था। कोर्ट ने हालांकि यह स्पष्ट किया था कि बैंक खाता खोलने तथा मोबाइल फोन कनेक्शन लेने या स्कूलों में दाखिले के लिए आधार की अनिवार्यता नहीं होगी। इसके बाद सरकार एक संशोधित बिल लेकर आई, जिसे संसद ने 8 जुलाई को पारित कर दिया। इस संशोधन के जरिए टेलीग्राफ एक्ट, 1885 तथा मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून, 2002 के तहत आधार नंबर का इस्तेमाल स्वैच्छिक तौर पर करने का प्रावधान किया गया।

संशोधन और नियमनों के जरिए बैंक खाता खोलने तथा मोबाइल फोन कनेक्शन हासिल करने के लिए अधिप्रमाणन और पहचान के सबूत के तौर पर भी आधार नंबर के स्वैच्छिक इस्तेमाल की इजाजत दी गई। इस मामले में पूर्व सैन्य अधिकारी एसजी वोम्बातकेरे तथा सामाजिक कार्यकर्ता वेजवाडा विल्सन ने दायर एक नई जनहित याचिका में आधार तथा अन्य कानून (संशोधन) एक्ट, 2019 आधार (प्राइसिंग ऑफ आधार अथॉन्टिकेशन सर्विसेज) रेगुलेशंस, 2019 को चुनौती दी है। इसमें संशोधनों को निजता, समानता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस नई याचिका को भी पहले से ही इस संबंध में लंबित अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ने का आदेश देते हुए नोटिस जारी किया। याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के बहुमत वाले फैसले में निगरानी की आशंका को दूर करते हुए आधार आधारित प्रमाणीकरण को सबसिडी का उपभोग करने वालों तक ही सीमित किया था। याचिका के मुताबिक, कानून में आधार सिस्टम को निजी कंपनियों के लिए खोलने के प्रावधान उन पाबंदियों के स्पष्ट उल्लंघन हैं और ये संवैधानिक तौर पर जायज नहीं है।

Posted By: Shashank Shekhar Bajpai