नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला को अर्पित कर दी। देश के सबसे बड़े व पुराने रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का निपटारा करते हुए कोर्ट ने यह भूमि मामले से जुड़े अहम पक्षकार रामलला विराजमान को सौंपने और मुस्लिम पक्षकार सुन्नाी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में दूसरी जगह पांच एकड़ जमीन मस्जिद निर्माण के लिए देने का आदेश दिया। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एक सदी से ज्यादा पुराने अयोध्या विवाद की ऐतिहासिक सुनवाई के बाद शनिवार को फैसला कर इतिहास रच दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने आस्था व विश्वास के आधार पर नहीं बल्कि सबूतों के आधार पर यह फैसला दिया है।

केंद्र के रिसीवर के पास रहेगा जमीन का कब्जा

सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन के अधिकार भगवान रामलला को सौंपे जाएं, जो कि इस मामले के एक पक्षकार हैं। हालांकि जमीन का कब्जा केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त रिसीवर के पास ही बना रहेगा। यह व्यवस्था केंद्र सरकार द्वारा अयोध्या एक्ट 1993 की धारा 6 के तहत एक अधिसूचना जारी कर किसी ट्रस्ट या अन्य निकाय को सौंपने तक बनी रहेगी। अदालत ने कहा कि तीन माह में एक ट्रस्ट बनाया जाए जो कि मंदिर निर्माण कराएगा।

राजस्व रिकॉर्ड में जमीन सरकारी

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में विवादित जमीन नजूल (सरकारी) थी। आगे इस जमीन को ट्रस्ट को सौंपने व उससे संबंधित कामों की निगरानी का जिम्मा केंद्र व उप्र सरकार का होगा।

सुन्‍नी वक्फ बोर्ड दावा साबित करने में विफल

कोर्ट ने कहा कि हिंदू पक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि बाहरी परिसर उसके कब्जे में रहा है, जबकि उप्र सुन्नाी सेंट्रल वक्फ बोर्ड अयोध्या मामले में अपना दावा साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि मस्जिद किसी खाली जमीन पर नहीं बनाई गई थी। ज्ञात हो कि विवादित स्थल पर मुगल शासक बाबर ने 16 वीं सदी में कब्जा कर वहां बाबरी मस्जिद बनवाई थी। इसे 6 दिसंबर 1992 को हिंदू कारसेवकों ने ढहा दिया था।

केंद्र चाहे तो निर्मोही अखाड़े को ट्रस्ट में ले

फैसले में कहा गया है कि मंदिर निर्माण के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट में केंद्र चाहे तो निर्मोही अखाड़े को प्रतिनिधित्व दे सकता है। वैसे कोर्ट ने इस अखाड़े का सेवायत के नाते मंदिर के प्रबंधन व सेवा का दावा खारिज कर दिया है।

खुदाई में मिला ढांचा इस्लामी स्वरूप का नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विवादित स्थल के नीचे की गई खुदाई में मिला ढांचा इस्लामी स्वरूप का नहीं है, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) यह साबित नहीं कर पाया है कि क्या मस्जिद बनाने के लिए मंदिर गिराया गया था। पुरातत्व सबूत को एक विचार मानना भी एएसआई की सेवाओं के प्रति बड़ा असम्मान होगा। हिंदू विवादित स्थल को भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं और यहां तक कि मुस्लिम भी इस स्थान के बारे में यही कहते हैं।

यहीं भगवान राम का जन्म हुआ, यह निर्विवाद

अदालत ने फैसले के साथ कई अहम टिप्पणियां भी की हैं। कोर्ट ने कहा कि हिंदुओं की मान्यता है कि भगवान राम का जन्म विवादित स्थल पर ही हुआ है, यह बात निर्विवाद है। सीता रसोई, राम चबूतरा व भंडार गृह इस स्थान के धार्मिक सबूतों की पुष्टि करते हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि जमीन के मालिकाना हक का फैसला आस्था व विश्वास के आधार पर नहीं हो सकता। ये सिर्फ विवाद के फैसले के संकेतक हो सकते हैं।

बाबरी मस्जिद गिराना कानून का उल्लंघन था

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराना कानून का उल्लंघन था। जस्टिस गोगोई ने कहा कि यह विध्वंस 14 अगस्त 1989 के इलाहाबाद हाई कोर्ट के यथास्थिति के आदेश व 15 नवंबर 1991 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसे कायम रखने के बावजूद किया गया। इसलिए इसकी क्षतिपूर्ति होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस क्षतिपूर्ति के रूप में केंद्र या उप्र सरकार अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए 'खास जगह उपलब्ध कराए। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उसे मिले विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश दिया है।

एक नजर :

- सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से सुनाया 1045 पेज का ऐतिहासिक फैसला

-तीन अन्य पक्षकारों-सुन्नाी वक्फ बोर्ड, शिया वक्फ बोर्ड व निर्मोही अखाड़े के दावे किए खारिज

-केंद्र को तीन माह में मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने और मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का आदेश

-2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2:1 के बहुबत से तीन हिस्सों में बांट दी थी विवादित जमीन

इन पांच जजों ने सुनाया सर्वसम्मत फैसला

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई

जस्टिस एसए बोबडे

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड

जस्टिस अशोक भूषण

जस्टिस एस. अब्दुल नजीर

हाई कोर्ट द्वारा जमीन के बंटवारे का फैसला गलत

2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन तीन पक्षकारों-सुन्नाी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मालिकाना हक के विवाद में जमीन का बंटवारा करने का हाई कोर्ट का आदेश गलत था।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद 14 अपीलें सुप्रीम कोर्ट में लगी थी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चार दीवानी मुकदमों की अपील पर उक्त फैसला सुनाया था। हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कुल 14 अपीलें सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं।

निचली कोर्ट में कुल चार केस थे

1. 1950 : रामलला के भक्त गोपाल सिंह विशारद ने सबसे पहले अयोध्या (पहले फैजाबाद) की निचली कोर्ट में दावा लगाकर मांग की थी कि विवादित जगह हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया जाए।

2. 1959 : निर्मोही अखाड़ा ने निचली कोर्ट में विवादित जमीन पर सेवायत के नाते प्रबंधन के अधिकार मांगे।

3. 1961 : उप्र सुन्नाी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने दावा लगाकर विवादित जमीन पर मालिकाना हक माना।

4. 1989 : भगवान 'रामलला विराजमान ने अपने मित्र व इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज देवकी नंदन अग्रवाल और जन्मभूमि (जन्मस्थान) ने दावा लगाकर पूरी विवादित जमीन पर मालिकाना हक मांगा। इन्होंने खुद को भगवान का रूप और 'न्यायिक व्यक्ति बताते हुए दावा किया।

हाई कोर्ट में ट्रांसफर : उक्त चारों केस 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट को ट्रांसफर कर दिए गए थे।

'हमारे देश की सरजमीं पर कई आक्रमण व संघर्ष हुए। सौदागर, यात्री व विजेता के रूप में यहां लोग आए, उन्होंने अपने ईश्वर को प्रस्थापित करने की कोशिश की, लेकिन सभी ने भारत की संस्कृति को आत्मसात किया। हमारे देश का इतिहास व संस्कृति सत्य की खोज का केंद्र रहा। इसका तरीका भले ही सांसारिक, राजनीतिक या आध्यात्मिक रहा हो। इस अदालत ने दो सवालों-दूसरों की आजादी और कानून के उल्लंघन के उत्तर खोजने की न्यायिक जिम्मेदारी को पूरा किया है।

-सुप्रीम कोर्ट

1885 में एक महंत ने दायर किया था पहला दावा

-करीब 500 साल पहले बाबर के सेनापति मीर बांकी ने रामजन्म भूमि पर कब्जा कर वहां मस्जिद बनाई थी। तभी से यह बाबरी मस्जिद कहलाने लगी थी।

-लेकिन इस पर हिंदुओं के हक का सबसे पहले कोर्ट में दावा एक महंत ने 1885 में लगाया था।

-महंत ने मस्जिद के बाहर एक अस्थाई तंबू लगाने की मांग की थी। हालांकि उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।

-अज्ञात लोगों ने 1949 में मस्जिद परिसर में घुसकर भगवान राम की मूर्तियां रख दी थीं। उसके बाद यहां पूजा-अर्चना शुरू हो गई थी।

Posted By: Navodit Saktawat