माला दीक्षित, नई दिल्ली। Ayodhya Judgement 2019: अयोध्या राम जन्मभूमि से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला आ चुका है। आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम माना जाता है क्योंकि इसके बाद किसी अन्य कोर्ट में सुनवाई नहीं होती है। फिर भी कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट पक्ष के पास दो कानूनी विकल्प हैं जिसका वह इस्तेमाल कर सकता है। पक्षकार सुप्रीम कोर्ट में ही पुनर्विचार याचिका दाखिल कर फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग कर सकते हैं। पुनर्विचार याचिका बेंच द्वारा अगर खारिज कर दी जाती है तो असंतुष्ट पक्ष क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर सकते हैं। हालांकि पुनर्विचार याचिका और क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई के नियम तय है।

तय नियमों के मुताबिक किसी भी फैसले के खिलाफ 30 दिन के भीतर पुनर्विचार याचिका लगाई जा सकती है। हालांकि याचिका पर वहीं बेंच विचार करती है जिसने यह फैसला सुनाया है। इसके साथ ही पुनर्विचार याचिका में यह साबित करना होता है कि फैसले में साफ तौर पर त्रुटि रही है।

आमतौर पर रिव्यू पिटीशन र खुली अदालत में सुनवाई नहीं की जाती है। बेंच ऐसी याचिकाओं पर जज चेंबर में सर्कुलेशन के जरिये सुनवाई करती है। वहां वकीलों की दलीलें नहीं होती हैं सिर्फ केस से जुड़ी फाइलें और रिकॉर्ड होता है जिस पर बेंच द्वारा दोबारा विचार किया जाता है।

पुनर्विचार याचिका के बाद होती है क्यूरेटिव याचिका दाखिल

बेंच द्वारा पुनर्विचार याचिका खारिज किए जाने के बाद 30 दिन के अंदर क्यूरेटिव याचिका दायर की जा सकती है। क्यूरेटव पिटीशन के नियम सख्त हैं। सामान्य तौर पर इस पर भी सुनवाई जज द्वारा सर्कुलेशन के जरिये चेंबर में ही करते हैं। क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई करने वाली बेंच में 3 सबसे सीनियर जज शामिल होते हैं और बाकी फैसला देने वाले जज होते हैं।

क्यूरेटिव दाखिल करने के लिए सीनियर एडव्होकेट का प्रमाणपत्र लगाना होता है जो बताता है कि यह मामला क्यूरेटिव याचिका के लिए कानूनी तौर पर महत्वपूर्ण हैं। क्यूरेटिव पिटीशन में कोर्ट के तथ्यों पर विचार नहीं किया जाता उसमें सिर्फ कानूनी प्रश्न पर ही विचार किया जाता है।

Posted By: Neeraj Vyas