कृषि कानून पर सरकार और किसान संगठनों के बीच अब तक का सबसे बड़ा टकराव बन गया है। शुक्रवार को 11वें दौर की वार्ता पूरी तरह बेनतीजा रही। सरकार ने यह प्रस्ताव दिया था कि वह 18 माह तक इन कानून के अमल पर रोक लगा देगी, लेकिन किसान संगठन अड़े रहे। वे कानून रद्द करने से कम में राजी नहीं है। वहीं किसान संगठन सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि सरकार ने जिद पकड़ रखी है। कुल मिलाकर 10वें दौर की वार्ता के बाद जो सकारात्म संकेत मिल रहे थे, वो अब पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं। शुक्रवार की बैठक के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार इससे बेहतर प्रस्ताव नहीं दे सकती है। दोनों पक्षों के बीच तल्खी का आलम यह है कि अगले दौर की वार्ती की तारीख भी तय नहीं है। वहीं सभी की नजर अब 26 जनवरी पर टिकी है, जब किसान दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च पर अड़े हैं। इस पर दिल्ली पुलिस और किसानों के बीच लगातार बैठकें जारी हैं।

...क्या हुआ यदि सरकार ने वापस ले लिए कृषि कानून

किसानों की मांग है कि सरकार कृषि कानून वापस ले ले। सवाल उठता है कि यदि सरकार दबाव में आकर ऐसा फैसला ले लेती है तो क्या होगा? इसका जवाब नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने दिया। उनका कहना है, अगर नए कृषि कानूनों को वापस लिया गया तो कोई सरकार इन्हें अगले 10-15 साल तक फिर लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी। अगर ऐसा हुआ तो यह किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए काफी नुकसानदायक होगा। कृषि का मसला अब काफी जटिल हो चुका है। आंदोलनकारी किसान भी सुधारों के पक्ष में हैं, लेकिन संभवतः वे चाहते हैं कि सरकार पहले उन्हें वापस ले और फिर नए कानून लाए। सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की चिंताओं के प्रति काफी लचीलापन दिखाया है।

Posted By: Arvind Dubey

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