जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। भारत सरकार इस समय हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन को लेकर असमंजस की स्थिति में फंसी हुई है। एक तरफ तो वह मानवता के आधार पर कोविड-19 कोरोनावायरस के इलाज में अहम माने जाने वाली दवा हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन दुनिया को दूसरे देशों को भी उपलब्ध कराना चाहती है लेकिन घरेलू हालात जिस तरह से बदल रहे हैं उसको देखते हुए वह इसका निर्यात खोल कर किसी भी तरह का जोखिम भी नहीं उठाना चाहती है। अमेरिका, ब्राजील सहित कम से कम 30 देश भारत से इस दवा की आपूर्ति करने की मांग कर चुके हैं। फिलहाल सरकार दवा निर्माताओं से इस संबंध में बात कर रही है ताकि इस दवा का उत्पादन तेजी से बढ़ाया जा सके, हालांकि अधिकारी यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि आनन फानन में उत्पादन भी बढ़ाना संभव नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पीएम नरेंद्र मोदी की दो दिन पहले टेलीफोन बातचीत में क्लोरोक्विन दवा का निर्यात करने का आग्रह किया गया था। बाद में ट्रंप ने बताया भी कि, हमने मोदी से मलेरिया के इलाज में काम ने वाली दवा हाइड्राक्लीक्लोरोक्विन दवा का निर्यात खोलने की अपील की है। भारत में इस दवा का निर्माण बड़े पैमाने पर किया जाता है। यह दवा कोरोना के इलाज में भी काफी कारगर है। मोदी ने कहा है कि वह इस पर गंभीरता से विचार करेंगे। ट्रंप के इस बयान के कुछ ही घंटे बाद ब्राजाली के राष्ट्रपति जे एम बोलसोनारो ने भी ट्विट कर कहा कि, " उनकी भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी से इस संबंध में बात हुई है और भारत से हाइड्राक्लीक्लोरोक्विन की आपूर्ति जारी रखने का आग्रह किया गया है। हम लोगों की जान बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं।'

भारतीय अधिकारियों का इस मामले में कहना है कि अमेरिका, ब्राजील के अलावा 30 यूरोपीय और एशियाई देशों ने भारत से इस दवा की मांग की है। इसमें पड़ोसी देश भी शामिल है। दरअसल, जब से अमेरिकी डाक्टरों ने यह कहा है कि मलेरिया में इस्तेमाल होने वाली यह दवा कोरोना के इलाज के लिए काफी कारगर है तब से इसकी मांग काफी ज्यादा बढ़ गई है। दूसरी तरफ, भारत पहले यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी 135 करोड़ आबादी के लिए यह दया आसानी से उपलब्ध रहे। इसलिए शनिवार को इसके निर्यात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया। यहां तक कि विशेष आर्थिक जोन से होने वाले निर्यात पर भी रोक लगा दी गई है। अभी तक अग्रिम राशि जिन कंपनियों ने ली थी उन्हें निर्यात की इजाजत दी गई थी लेकिन अब उस पर भी रोक लगा दी गई है। इसके पीछे वजह यह है कि सरकार अभी सही तरीके से स्थिति का आकलन करने में जुटी है कि भारत में इस दवा का उत्पादन क्षमता कितनी है और आपातकालीन हालात में इसको कितना बनाया जा सकता है।

दवा निर्माण से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भारत में मोटे तौर पर चार कंपनियां इप्का, मंगलम, व्हाइटल हेल्थ केयर और जाइडर कैडिला इसको बनाती हैं। इसमें मुख्य तौर पर 47 डाईक्लोरोक्वीनोलिन नाम के कच्चे माल का उपयोग होता है और इसे बनाने के लिए ईएमएमई नाम की एक अलग उत्पाद का उपयोग किया जाता है। ईएमएमई के लिए भारत मुख्य तौर पर चीन पर निर्भर रहता है।

मोटे तौर पर एक बार में भारत में संयुक्त तौर पर हाइड्राक्लीक्लोरोक्विन बनाने के लिए 60-80 टन कच्चा माल उपलब्ध होता है जिससे इसकी 20 करोड़ टैबलेट बनाई जा सकती हैं। आम दिनों में यह भारत के साथ ही दुनिया दे दूसरे मुल्कों की जरुरत पूरा करने के लिए काफी है। लेकिन अभी तमाम देशों की मांग पूरी करने में भारत भी सक्षम नहीं है। साथ ही अपने देश के नागरिकों और यहां संभावित आपातकालीन स्थिति का भी ख्याल रखना जरूरी है।

Posted By: Yogendra Sharma

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