नई दिल्ली। India China Dispute भारत-चीन सीमा पर तनावपूर्ण स्थिति की वजह चीन का अड़ियल रवैया और उसकी विस्तारवादी नीति है। लद्दाख को लेकर उसका ताजा बयान, उसके अड़ियल रवैये और विस्तारवादी नीति को ही दर्शाता है। चीन का आरोप है कि भारत ने लद्दाख पर अवैध कब्जा किया हुआ है। वह 1959 के प्रस्ताव के तहत भारत-चीन के बीच तय सीमा को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) मानता है, मैकमहोन लाइन को नहीं। 1914 में मैकमहोन लाइन को तिब्बत और भारत के बीच हुए शिमला समझौते के बाद अमल में लाया गया था।

यह लाइन तिब्बत और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सीमा को तय करती है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने चीन के बयान पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत ने कभी भी 1959 में चीन द्वारा एकतरफा तय की गई एलएसी को नहीं माना है।

चीन द्वारा 1959 में तय की गई सीमा के पीछे तत्कालीन प्रीमियर झाऊ एनलाई का दिमाग था। 24 अक्टूबर, 1959 को पहली बार एनलाई ने भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को एक पत्र लिखा था। इसमें कहा गया था कि चीन की कोई भी सरकार भारत के पूर्वोत्तर में खींची गई मैकमहोन लाइन को नहीं मानती। चीन और भारत के बीच इसको लेकर कभी भी कोई आधिकारिक सीमा तय नहीं हुई है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा

सात नवंबर, 1959 को एनलाई ने एक और पत्र पंडित नेहरू को लिखा था जिसमें उन्होंने पहली बार वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की बात की थी। पत्र में एनलाई ने कहा कि दोनों देशों की सेनाएं वर्तमान में जहां हैं, उसको एलएसी माना जाए। इसे एलएसी मानते हुए और सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए दोनों ही सेनाएं मौजूदा जगह से 20-20 किमी पीछे हट जाएं।

पंडित नेहरू ने अपने जवाब में चीन के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि चीनी सेना पहले से ही भारतीय सीमा में कई किमी अंदर आ चुकी है। ऐसे में भारतीय सैनिकों को पीछे नहीं हटाया जा सकता, वो भी तक जबकि चीन अपनी सीमा में वापस जाने को तैयार नहीं है।

चीन ने थोपा युद्ध

इस खत के तीन साल बाद चीन ने भारत पर युद्ध थोप दिया। 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने लद्दाख और मैकमहोन लाइन पर हमला शुरू किया। एक महीने तक चले इस युद्ध के बाद दोनों देशों की सेनाएं जहां थीं उसे 1993 में एलएसी का नाम दिया गया। मालूम हो कि भारत-चीन के बीच अब तक 1993, 1996 और 2005 में समझौते हो चुके हैं। दोनों देशों के बीच नक्शों के आदान-प्रदान को लेकर भी समझौता हो चुका है, जिस पर 2003 में चीन ने अमल से इन्कार कर दिया था।

Posted By: Sandeep Chourey

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