Muslim Law Board on Ayodhya Verdict: अयोध्या मामले (Ayodhya Case) पर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले से इस मसले का फिलहाल पटाक्षेप नहीं होने जा रहा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) तथा जमीयत उलमा-ए- हिंद ने शीर्ष अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है। बोर्ड ने जहां मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन लेने से इनकार किया है, वहीं जमीयत ने कहा कि फैसला सबूतों और तर्क पर आधारित नहीं है। दूसरी ओर, एक मुख्य मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी ने पुनर्विचार याचिका दाखिल किए जाने के फैसले से किनारा करते हुए कहा है कि वह चाहते हैं कि मंदिर-मस्जिद मसला अब यहीं खत्म होना चाहिए। अब AIMPLB की ओर से अलगे एक महीने में याचिका दायर की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि उस पर कब सुनवाई होगी और कौन-सी बेंच करेगी, क्योंकि जिस बेंच ने यह फैसला सुनाया है, उसमें शामिल चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई रिटायर हो चुके हैं।

एआईएमपीएलबी की लखनऊ में हुई बैठक के बाद बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी ने पत्रकारों से कहा- 'शरीयत के अनुसार, मस्जिद की जमीन अल्लाह की है और वह किसी को नहीं दी जा सकती।' उन्होंने कहा- 'बोर्ड ने साफतौर पर कहा है कि वह मस्जिद के बदले पांच एकड़ जमीन लेने के खिलाफ है। बोर्ड का यह भी मानना है कि मस्जिद का कोई विकल्प नहीं हो सकता है।'

जिलानी ने कहा कि 23 दिसंबर, 1949 की रात बाबरी मस्जिद में भगवान राम की प्रतिमा रखा जाना 'असंवैधानिक' था। तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कैसे 'आराध्य' मान लिया। हिंदू धर्म के मुताबिक भी वे प्रतिमाएं 'आराध्य' नहीं मानी जा सकतीं।

बोर्ड ने कहा है कि मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश न तो न्यायसम्य है और न ही नुकसान की भरपाई, इसलिए उसे स्वीकार करने से इनकार किया है। बोर्ड ने कहा- 'हममानते हैं कि सुन्नी वक्फ बोर्ड समुदाय के इस फैसले का सम्मान करेगा।' बोर्ड के मुताबिक, यह मामला समुदाय के प्रतिनिधित्व वाला है और वह इसी नाते पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगा।

मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए अयोध्या में ही किसी प्रमुख स्थान पर सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया है। वैसे, फैसले के दिन ही उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा था कि वह पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करेगा। इसके पहले, रविवार को ही जमीयत उलमा-ए-हिंद ने भी कहा कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पुनर्विचार याचिका के जरिए चुनौती दी जाएगी। जमीयत प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह फैसला वकीलों और विशेषज्ञों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद लिया गया है।

मदनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकारों की अधिकतर दलीलें और सबूतों को माना लेकिन फैसले उसके खिलाफ और हिंदुओं के पक्ष में दिया। सूत्रों ने बताया कि जमीयत की कार्यसमिति पुनर्विचार याचिका को लेकर दुविधा में थी और इस पर वकीलों और विशेषज्ञों से विमर्श कर फैसला लेने के लिए शुक्रवारको पांच सदस्यीय एक पैनल बनाई गई थी। पैनल ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का मुस्लिमों के खिलाफ आया फैसला अंतिम नहीं है और संविधान के तहत पुनर्विचार का विकल्प उपलब्ध है। मदनी ने कहा- 'पूरा न्याय नहीं हुआ है, क्योंकि मुसलमान मस्जिद को शिफ्ट नहीं कर सकते, इसलिए मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन स्वीकार करने का सवाल ही नहीं है।'

क्या हैं पुनर्विचार याचिका के तर्क

-एएसआई भी इस बात की पुष्टि करता है कि मस्जिद -मंदिर तोड़ कर नहीं बनाई गई।

- मस्जिद के नीचे मंदिर होने के कोई पुरातात्विक सबूत नहीं हैं।

-सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट- दोनों ने माना है कि बाबरी मस्जिद के अंदर 1949 में प्रतिमाएं अवैध ढंग से रखी गईं। उसके पहले तक वहां पांचों वक्त नमाज होती थी।

-मस्जिद को तोड़ा जाना 'गैरकानूनी कृत्य' था।

-मुस्लिम जहां 90 से अधिक वर्षों से नमाज पढ़ रहे थे, वह हिंदुओं को कैसे दे दी गई।

-कोर्ट ने भगवान रामलला को जमीन का मालिक नहीं माना है, फिर भी वह हिंदू पक्ष को सौंप दी गई।

-सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के 142 के इस्तेमाल में वक्फ एक्ट का ध्याननहीं रखा, जिसके मुताबिक मस्जिद की जमीन कभी बदली नहीं जा सकती है।

Posted By: Arvind Dubey