Bhagat Singh Birth Anniversary: यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि सरदार भगत सिंह के एक साथी प्रेमदत्त भी थे, जिन्होंने अपनी क्रांति की ज्वाला से अंग्रेजों के खेमे में हलचल मचा दी थी। क्रांतिकारी संगठन 'हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ' के सक्रिय सदस्य और सरदार भगत सिंह के साथी क्रांतिवीर प्रेमदत्त को भी सांडर्स के वध में बंदी बनाया गया था। बाद में उन पर 'लाहौर षड्‌यंत्र केस' के तहत लाहौर में केस चलाया गया।

किस्सा सन्‌ 1930 का है। उस दौर में भारत में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की मशाल चरम पर प्रज्ज्वलित हो रही थी। क्रांतिकारियों ने अपने नए-नए पैंतरों से अंग्रेजों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया था। इसी बीच जयगोपाल नामक एक कमजोर क्रांतिकारी, जो क्रांतिकारी संगठन का सदस्य था, टूट गया।

पैसों के लालच और पुलिस की मार के डर से वह गद्दारी कर बैठा और सरकारी गवाह बन गया। उसने अंग्रेजों के सामने क्रांतिकारियों के राज खोल दिए और अपने साथियों को फांसी व लंबी अवधि की सजा दिलाने में भी उसने प्रमुख भूमिका निभाई थी। न्यायालय में वह गवाहों के कठघरे में बड़ी शान से खड़ा होता था और क्रांतिकारियों को चिढ़ाने के लिए अपनी मूंछों पर ताव देता था।

छोटे कद के क्रांतिवीर प्रेमदत्त को उसकी यह हरकत अच्छी नहीं लगी। उन्होंने अपने एक पैर का जूता निकाला और भरी अदालत में ही निशाना साधकर जयगोपाल के सिर पर दे मारा। सरदार भगत सिंह ने प्रेमदत्त को प्रोत्साहित करते हुए कहा- 'बढ़िया निशाना लगाया है मेरे भाई! दूसरा और!' प्रेमदत्त दूसरा जूता मारते, उसके पहले ही पुलिस ने उन्हें अपने काबू में कर लिया।

7 अक्टूबर 1930 को जब 'लाहौर षड्‌यंत्र केस' का फैसला सुनाया गया, तब प्रेमदत्त को तीन वर्ष की अवधि के कठोर कारावास का दण्ड दिया गया। इस पर उनकी प्रतिक्रिया थी 'यदि गद्दार जयगोपाल को एक जूता और मारने दिया जाता तो मैं छह वर्ष का कारावास भुगतने के लिए भी सहर्ष तैयार हूं।'

Posted By: Arvind Dubey

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