नई दिल्ली। आज गणतंत्र दिवस है, इस गणतंत्र देश की आन बान और शा बनाए रखने के लिए सालों से सीमा पर हजारों सैनिकों ने बिना किसी परवाह के अपनी जान न्योछावर की है। इसी का नतीजा है कि आज हम देश में सुरक्षित हैं। इन शहीदों में कुछ की शहादत तो भुला दी गई वहीं कुछ ऐसे थे जो गुमनाम ही रह गए। इन शहीदों की लिस्ट में कुछ ऐसे नाम हैं जो अपने बलिदान के लिए सेना के बड़े सम्मान पा चुके हैं। उन्हें यह सम्मान ऐसे ही नहीं मिले बल्कि अपनी क्षमताओं से भी आगे जाकर देश की सेवा करने के लिए मिले हैं। इन्हीं में एक नाम है हंगपन दादा का।

अपने अदम्य साहस से 4 आतंकियों को ढेर कर शहीद होने वाले अरुणाचल प्रदेश के हंगपन दादा को साल 2016 में सेना ने मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। हंगपन दादा 2016 के मई महीने में ही शहीद हुए थे। उनकी शहादत और शौर्य की गाथा सुनकर आपके भी रगों में जोश भर जाएगा।

दरअसल, 26 मई 2016 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के नौगाम सेक्टर में सेन्य ठिकानों का आपसी संपर्क टूट गया था। तब खबर मिली की आतंकी घुसपैठ हो रही है। उस वक्त हवलदार हंगपन दादा और उनकी टीम का जिम्मा सौंपा गया कि आंतकियों का पीछ कर उन्हें पकड़ना है। अधिकारियों से मिले आदेश का तुरंत पालन करते हुए हंगपन दादा और उनकी टीम LoC के पास स्थित शामशाबारी माउंटेन पर करीब 13000 की फीट की ऊंचाई वाले बर्फीले इलाके में इतनी तेजी से आगे बढ़ी कि उन्होंने आतंकवादियों के बच निकलने का रास्ता रोक दिया।

इस बीच आतंकियों ने फायरिंग शुरू कर दी। आतंकवादियों की तरफ से हो रही भारी गोलीबारी के कारण हंगपन दादा और उनकी टीम आगे नहीं बढ़ पा रही थी। ऐसे हालात में हंगपन दादा अकेले ही जमीन पर पेट के बल रेंगते हुए और पत्थरों की आड़ में छुपकर आतंकियों के काफी करीब पहुंच गए। इस तरह उन्होंने दो आतंकियों को मार गिराय लेकिन आतंकियों की फायरिंग में बुरी तर जख्मी हो गए।

इसी बीच इनमें से तीसरा आतंकवादी बच निकला और भागने लगा। दादा ने उसे भागते देख जख्मी होने के बाद भी उसका पीछा किया और उसे पकड़ लिया। इस दौरान दादा की इस आतंकी के साथ हाथापाई भी हुई, लेकिन उन्होंने तीसरे आतंकी को भी मार गिराया। इस एनकाउंटर में चौथा आतंकी भी मार गिराया गया।

कौन थे हंगपन दादा

- हंगपन दादा अरुणाचल प्रदेश में बोदुरिया गांव के निवासी थे।

- हंगपन दादा 1997 में सेना की असम रेजीमेंट में शामिल हुए थे और 35 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे।

- जिस राइफल्स में वो तैनात थे वह बल अभी आतंकरोधी अभियानों में हिस्सा लेता है।

- आतंकियों की ओर से भारी गोलीबारी के बीच अपने टीम के सदस्यों की जान बचाई थी।

- उनकी पत्नी का नाम चशेन लोवांग है। दादा के दो बच्चे हैं।

- एक बेटी है जिसका नाम राउखिन है और एक बेटा है जिसका नाम सेनवांग है।

Posted By: Ajay Barve

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