पश्चिमी सिहभूम। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम में पत्थलगड़ी समर्थकों ने एक हत्याकांड को अंजाम देते हुए पत्थलगड़ी का विरोध करने वाले सात ग्रामीणों की हत्या कर दी है। मृतकों में गुलीकेरा ग्राम पंचायत के उपमुखिया जेम्स बढ़ भी हैं। हत्यारों ने हत्याकांड को अंजाम देने के बाद शवों को पास के जंगल में फेंक दिया । गांव के दो अन्य लोग अभी भी गायब हैं, जिनकी भी हत्या की आशंका जताई जा रही है। मंगलवार की दोपहर इस घटना की जानकारी मिलने के बाद गुदड़ी थाना पुलिस घटनास्थल पहुंची। घटनास्थल बुरुगुलीकेरा गांव सोनुआ से 35 किलोमीटर दूर जंगल और घोर नक्सल प्रभावित इलाके में है। लिहाजा पुलिस सुरक्षा को ध्यान में रखकर वहां पहुंचने में काफी सावधानी बरत रही है।

हत्या से पहले की ग्रामीणों की पिटाई

गुदड़ी थाना प्रभारी अशोक कुमार के अनुसार पत्थलगड़ी समर्थकों के द्वारा रविवार को ग्रामीणों के साथ बैठक का आयोजन किया था। इस दौरान पत्थलगड़ी समर्थक पत्थलगड़ी का विरोध करनेवाले उपमुखिया जेम्स बूढ़ और अन्य छह लोगों को पीटने लगे। पिटाई होते देख डरकर उनके परिजन वहां से भाग गए। इसके बाद पत्थलगड़ी समर्थक ग्रामीणों को उठाकर जंगल की ओर ले गए। रविवार को जब वो लोग घर वापस नहीं लौटे तो सोमवार को उपमुखिया जेम्स बूढ़ और अन्य छह लोगों के परिजन गुदड़ी थाना पहुंचे। उन्होंने इस सारे मामले की जानकारी पुलिस को दी। पुलिस लोगों के गायब होने के मामले की छानबीन में लगी ही थी कि मंगलवार दोपहर को संबंधित लोगों की हत्या कर उनका शव जंगल में फेंक दिए जाने की सूचना मिली।

पत्थलगड़ी समर्थकों से मुकदमे हटाए जा रहे हैं

हेमंत सोरेन 29 दिसंबर को राज्य के मुख्यमंत्री बनते ही निर्णय लिया था कि पत्थलगड़ी समर्थकों पर लगे देशद्रोह के मुकदमे समाप्त किए जाएंगे। इस मामले में यह माना गया कि पूर्व की सरकार ने गलत तरीके से इन लोगों पर मुकदमा किया था। सीएम सोरेन के फैसले के बाद ऐसे लोगों से मुकदमा वापस लिए जाने की कवायद शुरू हो चुकी है। अब इस घटना के बाद सरकार के रुख पर निगाहें रहेगी।

यह है पत्थलगड़ी का मामला आदिवासी बहुल इलाकों में पत्थलगड़ी की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें गांव के श्मशान से लेकर गांव की सीमा तक पत्थर गाड़कर संदेश दिया जाता है। गांव और जमीन की सीमा इंगित करने, किसी व्यक्ति की स्मृति में, महत्वपूर्ण अवसरों को याद रखने तथा समाज के महत्वपूर्ण फैसले को लोगों तक पहुंचाने के लिए धरती में पत्थर गाड़ते हैं। इसका पारंपरिक महत्व किसी सरकारी दस्तावेज या सीमांकन से ज्यादा है। इसे ही पत्थलगड़ी कहा जाता है। इसलिए है विवाद : पत्थलगड़ी अब क्षेत्रों में सरकार को नकारने तथा स्वतंत्र व्यवस्था स्थापित करने के आंदोलन के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। पत्थलगड़ी अभियान के तहत आदिवासी अपने संदेश को पत्थर पर लिखकर गांव की सीमा के पास गाड़ देते हैं। इस पर लिखा होता है कि गैर आदिवासी को बिना अनुमति गांव में प्रवेश नहीं करना है। यहां तक कि वे किसी भी सरकारी योजना का विरोध करते हैं।

Posted By: Yogendra Sharma

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