मल्टीमीडिया डेस्क। नासा में दुनिया के बेहतरीन वैज्ञानिकों की फौज अपोलों की लॉन्चिंग में जुटी हुई थी। सबकुछ तयशुदा प्रोग्राम के तहत चल रहा था कि अचानक इस बेहद खास अभियान में लगे हुए 31 कम्प्यूटर बंद हो गए। ऐसे बेहद संवेदनशील समय में भारत के एक गणितज्ञ ने मोर्चा संभाला और 31 कम्प्यूटर्स पर की जाने वाली गणना करने लगे। जब सभी 31 कम्प्यूटर्स ठीक हुए तो चौंकाने वाली बात सामने आई। भारत के इस गणितज्ञ और कम्प्यूटर्स की गणना एक जैसी थी।

पटना से तय किया अमेरिका तक का सफर

दुनियाभर में गणित के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन करने वाले इन गणितज्ञ का नाम वशिष्ठ नारायण सिंह था। वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल 1946 को भोजपुर जिले के बसंतपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम लाल बहादुर सिंह और माता का नाम लहसी देवी था। वशिष्ठ नारायण सिंह तीन भाई और दो बहनों में सबसे बड़े थे। जब वह पटना साइंस कॉलेज में पढ़ते थे तब वो अपने शिक्षक को गलत पढ़ाने पर टोक देते थे। कॉलेज के प्रिंसिपल को जब इस बात का पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई जिसमें उन्होंने बेहतर प्रदर्शन करते हुए सारे रिकार्ड तोड़ दिए।

कैलिफोर्निया से की पीएचडी और नासा को दी सेवाएं

पटना साइंस कॉलेज में पढ़ने के दौरान कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली के पास उनकी प्रतिभा की खबर पहुंची और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका के लिए रवाना हो गए। 1969 में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से उन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए।

उससे बाद उनको नासा ने अपनी सेवाएं देने के लिए चुना, लेकिन विलायत की चकाचौंध उनको लुभा नहीं पाई और 1971 में उन्होंने भारत का रुख कर लिया। अपनी सरजमी पर लौटने के बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर, आईआईटी मुंबई और फिर आईएसआई कोलकाता में नौकरी की।

1989 में जूठन चुनते हुए मिले थे

1973 में वशिष्ठ नारायण सिंह वंदना रानी सिंह के साथ परिणय सूत्र में बंध गए। इसी दौरान उनका व्यवहार काफी असामान्य हो गया और उनको स्किट्सफ्रीनिया की बीमारी होने का पता चला। 1976 में उनको रांची के एक अस्पताल में भर्ती किया गया। 1987 में वो अपने गांव लौट आए और 1989 में अचानक गायब हो गए। 1993 में वो डोरीगंज, सारण में एक भिखारी के पास जूठन चुनते हुए दिखाई दिए।

बताया जाता है कि 1989 में इलाज के लिए जब वो पुणे जा रहे थे उस वक्त एमपी के खंडवा स्टेशन पर उनका साथ उनके भाई से छूट गया था। इस बीच उनकी इस तरह की बीमारी का पता चलने पर उनकी पत्नी ने भी उनको तलाक दे दिया था।

अपनी गंभीर बीमारी की अवस्था में वो पेंसिल लेकर हर कही गणित के रहस्यों को हल करने में जुटे रहते थे। करीब 40 साल उन्होंने गुमनामी का जीवन जीया। दुनियाभर को गणित के रहस्यों से रुबरु करवाने वाला गणितज्ञ आज ब्रहमाण्ड की गहराईयों में गुम हो गया। उन्होंने ऊंचाइयों को छुआ और गुमनामी में भी जीवन बिताया। लेकिन उनकी उपलब्धियां बेहद शानदार और रश्क करने वाली रही है।

Posted By: Yogendra Sharma