नितिन प्रधान, नई दिल्ली। सस्ते कर्ज का रास्ता साफ करने के लिए बचत दरों में कमी का सिलसिला खत्म होता नजर नहीं आ रहा। बैंकों की जमा दरों में कमी की उम्मीदों के बीच लघु बचत स्कीमों की ब्याज दर में और कटौती के आसार बन गए हैं।

नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (एनएससी) और पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (पीपीएफ) जैसी बचत स्कीमों पर मिल रहे ब्याज की दर में अगले दो माह में एक और कटौती की संभावना है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित बुजुर्ग होंगे, जो सुरक्षित और बेहतर ब्याज की उम्मीद में सरकारी छोटी बचत स्कीमों में पैसा लगाते हैं।

चालू वित्त वर्ष 2016-17 से हर तीन महीने में छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर की समीक्षा करने का फैसला किया गया है। यह समीक्षा समान मियाद वाले सरकारी बांड पर ब्याज दरों में फेरबदल के आधार पर होगी। इसकी शुरुआत पहली अप्रैल से हुई, जब विभिन्ना योजनाओं पर ब्याज दरों में 1.3 फीसद तक की कटौती कर दी गई।

नई व्यवस्था के तहत ब्याज दरें बाजार के चलन के मुताबिक रहेंगी। अभी तक इन स्कीमों पर ब्याज दर में संशोधन सालाना आधार पर होता था, अब यह तिमाही आधार पर होगा। इस आधार पर अगली समीक्षा 15 जून को पहली जुलाई से 30 सितंबर की तिमाही के लिए होगी।

दूसरी तिमाही में भी होगी कमी

आर्थिक मुद्दों पर नजर रखने वाली जानी मानी एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुताबिक, दूसरी तिमाही में ब्याज दर पहली से 0.20 से 0.25 फीसद तक कम हो सकती है। इसकी तीन वजहे हैं। पहली, नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट घटने से सरकारी बांड पर आय यानी यील्ड में कमी के आसार हैं।

दूसरा, नकदी प्रबंधन को लेकर रिजर्व बैंक की नई नीति और तीसरा रेपो रेट (वह दर जिस पर रिजर्व बैंक कम अवधि के लिए बैंकों को कर्ज देता है) और रिवर्स रेपो रेट (बैंको को आरबीआइ के पास अतिरिक्त नकदी रखने पर मिलने वाली दर) के बीच अंतर एक से घटाकर आधा फीसद कर दिया गया है।

व्यवस्था बनाए रखने को कमी जरूरी

एजेंसी मानती है कि ब्याज दर में कमी से बड़ी तादाद में लोग प्रभावित होंगे। मगर बाजार के हिसाब से ब्याज दरें नहीं बदली गईं तो व्यवस्था चरमरा सकती है। बाजार दर से ज्यादा ब्याज देने का मतलब है नेशनल स्मॉल सेविंग्स फंड (एनएसएसएफ) में आमदनी और खर्च के बीच अंतर बढ़ना।

वित्त वर्ष 1999-2000 में यह अंतर 1,681 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2015-16 में बढ़कर यह 13,010 करोड़ रुपये हो गया। छोटी बचत स्कीमों से जुटाई रकम का बड़ा हिस्सा सरकारी बांड और छोटा हिस्सा इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कम्पनी के बांड में लगाया जाता है। इनसे हुई कमाई को एनएसएसएफ में जमा किया जाता है।

वर्ष 2012-13 से 8.5 फीसद की औसत ब्याज दर से कमाई हुई। इसके मुकाबले 8.6 फीसद से ज्यादा दर से ब्याज अदा किया गया। चालू वर्ष 2016-17 के दौरान कमाई की औसत ब्याज दर 8.3 फीसद रहने का अनुमान है, जबकि भुगतान की औसत ब्याज दर 8.5 फीसद।

बैंकों की एफडी स्कीमों से मुकाबला

छोटी बचत योजनाओं का मुकाबला बैंकों की मियादी जमा योजना से है। बेहतर ब्याज दर के साथ कुछ मामलों मे टैक्स छूट की व्यवस्था सरकारी स्माल सेविंग स्कीमों को बैंकों की फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) से बेहतर विकल्प बना देती है।

बैंक कहते रहे हैं कि इन बचत योजनाओं पर ज्यादा ब्याज दर ऊंची होने की वजह से वे रेपो दर में कमी का पूरा फायदा कर्ज पर नहीं दे पाते। फिलहाल, छोटी बचतों पर ब्याज दर घटने का सिलसिला जारी रहा तो बैंकों के लिए कर्ज सस्ता करना आसान हो सकता है।