जयपुर। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और हाल में राज्यसभा सांसद बने सुधांशु त्रिवेदी का कहना है कि जवाहरलाल नेहरू से लेकर पी.वी. नरसिम्हाराव तक कांग्रस कुछ हद तक “सेंसेबल“ थी, लेकिन सोनिया-राहुल के युग में समस्या शुरू हो गई। त्रिवेदी शनिवार को जयपुर में पार्टी मुख्यालय में मीडिया से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेता आज सावररकर को भारत रत्न देने का विरोध कर रहे है, लेकिन सावरकर पर डाक टिकट कांग्रेस की पूर्व सरकार के समय ही जारी हुआ। कांग्रेस के कई नेताओं ने सावरकर की तारीफ की है। ऐसा इसलिए है कि पहले ऐसे मामलों में कांग्रेस की स्थिति ठीक थी, लेकिन अब खराब हो गई है।

उन्होंने कहा कि सावरकर पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें अंग्रेजों ने दो जन्म का कारावास दिया था, लेकिन कांग्रेस का एक नेता ऐसा बता दीजिए जिसे कालापानी या फांसी की सजा हुई है। लाला लाजपत राय को दें किसी कांग्रेसी नेता पर लाठियों से प्राणघातक हमला तक नहीं हुआ। उन्होंंने कहा कि कांग्रेस में प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विभ्रम की स्थिति है। कांग्रेस आज तक कश्मीर से लेकर एनआरसी और ट्रिपल तलाक जैसे मुददों पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाई है।

वैश्विक मंदी का असर है- त्रिवेदी ने यह माना कि विश्वस्तर पर आर्थिक मंदी का असर भारत में भी है, लेकिन इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था सबसे तेजी से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से है। बेरोजगारी के मुददे पर उन्होंने कहा कि सरकार के कार्यकाल में हर क्षेत्र में रोजगार बढ़ा है। दोगुनी गति से सड़क बनी है, रेल बनी है, करोड़ों मकान बने है। इन सबसे भी रोजगार पैदा हुआ है।

मनमोहन सिंह जब वित्त मंत्री थे तो देश का सोना गिरवी रखा गया था। रूप्ए का अवमूल्यन हुआ और आज वेश्विक मंदी के बावजूद हमारा विदेशी मुद्रा भंडार भरा हुआ है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में राजस्थान के प्रभारी रहे सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि जब से राजस्थान में कांग्रेस की सरकार आई है, तब से हर क्षेत्र में गिरावट आई है।

यही कारण है कि पहले कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हारी और इसके बाद भी स्थिति ठीक नहीं हुई। राजस्‍थान में कानून व्यवस्था की स्थिति इससे ज्यादा खराब कभी नहीं रही। थाने से अपराधी अपने साथी को छुड़ा ले गए। हर रोज दस महिलाएं और बच्चियां किसी न किसी ज्यादती की शिकार हो रही है।

यह सरकार जनता का सीधा मुकाबला नहीं करना चाहती, इसलिए निकाय चुनाव में प्रत्यक्ष चुनाव का फैसला बदला और बाद में सरकार को लगा कि पार्षद भी उनका साथ नहीं देंगे तो बाहर से किसी को भी निकाय अध्यक्ष बनाने का प्रावधान कर दिया। यह स्थिति बताती है कि सरकार की हालत कितनी खराब है।

Posted By: Navodit Saktawat