मनीष गोधा,जयपुर। राजस्थान का एक मात्र पर्वतीय पर्यटन स्थल माउंट आबू अपनी खूबसूरती के साथ ही एक विरासत भी अपने में समेटे है। आज करीब एक सदी बाद यह विरासत अपने मूल स्वरूप में उपयोगी हो गई है। माउंट आबू में अंग्रेजों के जमाने का क्वारंटाइन सेंटर बना हुआ है। इसमे पांच छह कमरे है। एक चारदीवारी है और यदि इसे फिर से संवार दिया जाए तो यह आज भी लोगों को क्वारंटाइन करने के काम आ सकता है।

राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू राजस्थान का एक मात्र पर्वतीय पर्यटन स्थल है और चूंकि अंग्रेंजों को पहाडो से काफी लगाव था, इसलिए यहां भी ब्रिटिशराज की कई निशान नजर आ जाते है। राजस्थान का राजभवन आज भी गर्मियों में यहां शिफ्ट हो जाता है। इन निशानियों में से एक क्वारंटाइन सेंटर है। माउंट आबू के प्रवेश द्वार पर ही एक कोने में यह क्वारंटाइन सेंटर बना हुआ है। यानी मुख्य शहर से बाहर की तरफ। बताया जाता है कि इसका निर्माण अंग्रेजो ने सन 1900 के आस-पास कराया था। यहां के स्थानीय निवासी भंवर सिंह बताते हैं कि यहां टीबी, चेचक, प्लेग आदि के रोगियों को रखा जाता था। इसे क्वारंटाइन सेंटर कहते थे, क्योंकि इन बीमारियों के रोगियों को परिवार से अलग रखने की जरूरत होती थी। माउंट आबू के सभी पुराने लोग इसके बारे में जानते हैं। वे बताते है कि यहां पास ही नाला है, जिसे यहां की स्थानीय भाषा में क्वारांटीन का धरा कहते है।

देश की आजादी के बाद इस भवन का उपयोग औषधालय, स्कूल आदि के लिए भी हुआ। नेहरू युवा केन्द्र के कुछ ग्रीष्मकालीन शिविर भी यहां लगे। अब कोरोना के मामले में क्वारंटाइन की चर्चा आने के साथ ही यह भवन भी लोगो को एकाएक याद आ गया है। हालांकि अभी यह काफी खस्ता हालत में है। माउंट आबू नगर पालिका के आयुक्त जितेन्द्र कुमार व्यास कहते हैं कि यह माउंट आबू की विरासत है। इसे सहेजने और आज की जरूरत हिसाब से काम में लेने के लिए हम विचार बना रहे है,क्योंकि लोकेशन के लिहाज से यह काफी उपयोगी हो सकता है। मुख्य शहर से कुछ दूरी पर है और आसपास का वातावरण भी ठीक है।

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