मनीष गोधा, जयपुर। राजस्थान की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस बार काफी कठिन दिख रहा है। इस संकट में अब तक उनके मनमुताबिक चीजें होती नजर नहीं आई हैंं और संकट लम्बा खिंचता जा रहा है। राजस्थान में ऐसी स्थिति आमतौर पर अब तक गहलोत के साथ नहीं देखी गई हैं।राजस्थान में चल रहे मौजूदा सियासी संकट को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने समय रहते भांप तो लिया, लेकिन इस संकट को खत्म करने में वे सफल नहीं हो पा रहे है। जून में राज्यसभा चुनाव के समय तो वे किसी तरह से संकट टालने में सफल रहे, लेकिन अब उन्हें मनमुताबिक परिणाम मिलते नहीं दिख रहे हैंं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि सचिन पायलट के खिलाफ बहुत मजबूत रिपोर्ट और फीडबैक केन्द्र को भेजा गया था और उन्हें उम्मीद थी कि सचिन के खिलाफ पार्टी कोई बडी कार्रवाई कर देगी, लेकिन पार्टी ने उन्हें सिर्फ पदों से हटाया है, सचिन अभी भी पार्टी में बने हुए है और आलाकमान से जैसी कार्रवाई अशोक गहलोत चाहते थे, वैसी अभी तक नहीं हुई है।

सचिन के साथ गए बागी विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकाने का मामला भी कोर्ट में जा कर फंस गया। हाईकोर्ट से यथास्थिति का फैसला सचिन के पक्ष में माना जा रहा है। वहीं अब यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट चला गया। ऐसे में यह विषय भी उनकी उम्मीद से ज्यादा लम्बा खिंच गया और आगे और लम्बा जा सकता है।जहां तक विधानसभा सत्र बुलाने का सवाल है तो यहां भी मामला फंस गया है। वे अपनी सरकार के लिए विश्वासमत हासिल करने की बात लिखित तौर पर देना नहीं चाहते और इसके अलावा ऐसा कोई कारण नहीं है, जिसके लिए राज्यपाल तुरंत सत्र आहुत करें। राजभवन के घेराव की चेतावनी और यहां धरना दे कर वे पहले ही टकराव मोल ले चुके है।

जानकार बताते हैं कि मंत्रिमण्डल की सिफारिश राज्यपल को माननी तो होगी, लेकिन अब यह देखना होगा कि खुद राज्यपाल इसका फैसला कितने समय में करते हैं। ऐसे में सचिन पायलट गुट को अपनी रणनीति बनाने के लिए और लम्बा समय मिल जाएगा। वहीं गहलोत के लिए अपने विधायकों लम्बे समय तक होटल में बंद रखना भारी होता जा रहा है। राज्य में कोरोना की स्थिति बिगडती जा रही है और सरकार के बाकी कामकाज भी इससे प्रभावित हो रहे है और सरकार के प्रति जनता में संदेश अच्छा नहीं जा रहा है।

पहले नहीं फंसे कभी ऐसे संकट में-

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उन लोगों में माने जाते है जो राजनीति के बहुत अच्छी तरह समझते हैंं। उनके अब तक के राजनीतिक जीवन में भी उन्हें ऐसी चुनौती पहले कभी नहीं मिली और न ही उनके मुख्यमंत्री रहते कभी इतना लम्बा राजनीतिक संकट रहा है। अपने पहले कार्यकाल 1998 से 2003 के बीच तो वे राजस्थान में कांग्रेस के दिग्गजों में शामिल परसराम मदेरणा, चंदनमल बैद, नवलकिशोर शर्मा, शिवचरण माथुर, गुलाब सिंह शक्तावत, खेत सिंह राठौड जैसे नेताओं की मौजूदगी के बावजूद आसानी से पांच साल निकाल गए थे।

इसके बाद 2008 से 2013 के बीच दूसरे कार्यकाल में उन्हें तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी से कुछ हद तक चुनौती मिली और करीब ढाई साल तक सत्ता व संगठन के बीच टकराव नजर आता रहा, लेकिन तब भी गहलोत के लिए बहुत ज्यादा मुश्किलें नहीं दिखी, क्योंकि पार्टी में टकराव तो था। कुछ विधायक भी उनके खिलाफ दिल्ली के चक्कर लगाते रहते थे, लेकिन आज जैसी बगावत नहीं हुई और वो पांच साल भी गहलोत आसानी से निकाल ले गए।

इस कार्यकाल में भी अब तक गहलोत लगभग हर मामले में पायलट पर भारी दिखते रहे। वे मुख्यमंत्री बने, बाद में मंत्रिमण्डल भी बहुत हद तक अपने हिसाब से बनाने में सफल रहे और विभागों का बंटवाार तो पूरी तरह से उनके हिसाब से हुआ, जिसमें वित्त और गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग खुद उन्होंने अपने पास रखे। उधर पायलट लगातार यह आभास देते रहे, कि उन्होंने स्थितियों को स्वीकार कर लिया है, लेकिन अब जिस रूप में यह बगावत सामने आई है, यह गहलोत के लिए मुख्यमंत्री के रूप में उनके राजनीतिक जीवन का पहला अनुभव है।

Posted By: Navodit Saktawat

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Ram Mandir Bhumi Pujan
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