जयपुर। जम्मू कश्मीर के बारामुला में एक बच्चे को बचाते हुए शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान दीपचंद वर्मा ने घटना से एक दिन पहले ही मां को फोन कर कहा था कि 11 जुलाई से उनकी छुटटी मंजूर हो गई है और वो गांव आ रहे है। नियति को कुछ और ही मंजूर था। दीपचंद गांव तो आए लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए आए। गुरुवार शाम को सीकर जिले में स्थित उनके पैतृक गांव बावडी में उनकी पार्थिव देह पहुंची तो पूरा गांव भारत माता की जय और देशभक्ति के नारों से गूंज उठा। बाद में अंतिम यात्रा निकाल कर सैनिक सम्मान के साथ दीपचंद का अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम यात्रा में गांव सहित आसपास के क्षेत्रों के लोग भारी संख्या में एकत्र हुए और शहीद को अंतिम विदाई दी। परिवार के लिए हालांकि पूरा दिन बहुत भारी बीता। उनकी मां, पत्नी और बच्चों को संभावना मुश्किल हो रहा था।

सीआरपीएफ के जवान दीपंचद वर्मा शुरू से सेना में जाना चाहते थे। परिजन और साथी बताते हैं कि उनके घर के पास चार लोग सेना में थे। उन्हें देख कर उनके मन में भी सेना में जाने की इच्छा पैदा हुई थी। शहीद के भाई सुनील ने बताया कि दीपचंद ने कभी रोजगार के दूसरे साधन या भर्तियों की ओर ध्यान नही दिया। उनका लक्ष्य ओर मेहनत आखिरकार रंग लाई व 2003 में सीआरपीएफ की भर्ती में उनका चयन कांस्टेबल पद पर अजमेर में हो गया। इस समय वे काॅलेज में प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। शहीद दीपचंद दौड़ व हॉकी के अच्छे खिलाडी थे। गांव से लेकर सेना तक की कई प्रतियोगिताओं में वह कई अवार्ड जीत चुके थे। सेना की मैराथन में भी उन्हें गोल्ड मेडल हासिल किया था।

घटना से ठीक एक रात पहले मंगलवार को दीपचंद ने पत्नी सरोज देवी और मां प्रभाती देवी को फोन किया था और यह बताया था कि उनकी 11 जुलाई से छुटटी मंजूर हो गई है और वे गांव आएंगे, लेकिन अगले ही दिन उनके शहीद होने की खबर आ गई। दरअसल दीपचंद का गांव सीकर में है, लेकिन उन्हें अजमेर में सीआरपीएफ क्वार्टर मिला हुआ है, इसलिए बच्चे वहां रहकर पढ़ाई कर रहे है। उनके दो जुड़वां बेटे विनय और विनीत हैं, जो पांचवीं में पढ़ते हैं। उनकी एक 13 साल की बेटी कुसुम है, जो सातवीं में है। उनका एक छोटा भाई और चार बहने हैं। उनके पिता की दो साल पहले मौत हो चुकी है।

Posted By: Arvind Dubey

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