इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। आज सावन का दूसरा सोमवार है। आप देश के बारह ज्योतिर्लिंगों से तो परिचित होंगे, लेकिन हम आज कुछ शिवालयों से रूबरू करवा रहे हैं, जिनसे आप अनजान हैं। मध्यप्रदेश में उनकी प्रतिष्ठा किसी ज्योतिर्लिंग की तरह ही है। उसी आस्था से वे वहां जाते हैं और पूजन-अर्चन करते हैं। हम श्रावण मास के इस सोमवार को भी ऐसे शिव मंदिरों की बात कर रहे हैं, जो कम लोकप्रिय है, लेकिन मालवा-निमाड़ में आस्था का केंद्र हैं। यहां भी श्रावण मास में सैकड़ों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं।

सिद्धेश्वर महादेव

इंदौर शहर से 40 किलोमीटर दूर नबीपुर स्थित सिद्धेश्वर महादेव हरिहर आश्रम के प्रति ग्रामीणों की आस्था किसी ज्योतिर्लिंग से कम नहीं है। पहाड़ों के बीच प्राकृतिक वातावरण में स्थित इस धार्मिक स्थल की खूबसूरती सावन में कई गुना बढ़ जाती है। इसके गुंबद पर रामायण के सभी चरित्र नजर आते हैं। राम, रावण, हनुमान, सीता, जानकी हमें रामायण के विभिन्न प्रसंगों की सैर कराते हैं। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की गोद में बने इस मंदिर में पहुंचने के लिए कनाड़िया रोड से होते हुए ग्राम सेमलिया चाउ फिर पटाडी गांव के बाद नबीपुर तक जाना होगा।

यहां तक आप बस या अपने वाहन से पहुंच सकते हैं। नबीपुर से आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होगा। करीब 3 किमी कच्ची पगडंडी और घने जंगल से होते हुए इस मंदिर तक पहुंच जाएंगे। यहां गायत्री मंदिर भी आकर्षण का केंद्र है। इसी के आगे जंगल में अश्वत्थामा की तपोभूमि है। कहा जाता है कि अश्वथामा ने इष्टदेव को प्रसन्न करने के लिए यहां तप किया था। यहां एक आम के पेड़ से अदृश्य जलधारा सतत बहती है। श्रद्धालु सावन में इसी से सिद्धेश्वर महादेव का जलाभिषेक करते हैं। आस्था के साथ यह स्थान एडवेंचर पसंद करने वालों के लिए अच्छी जगह है।

38 साल पहले ग्रामीणों ने किया था जीर्णोद्धार

आश्रम से जुड़े कैलाश कुलावट बताते कि पश्चिम बंगाल से एक तपस्वी देवानंद गिरी महाराज ने यहां तप किया था। इसके बाद 80 के दशक में गांव वालों की मदद से इस मंदिर का निर्माण किया और तब से इस स्थान को हरिहर आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर की खासियत इसका गुंबइ है जिस पर रामायण के सम्पूर्ण पात्रों को स्थान दिया गया है। इसमें रावण को भी प्रमुखता से दर्शाया गया है।

नदी किनारे भीमघाट पर शिव मंदिर की अपनी महिमा

शाजापुर। चीलर नदी के किनारे भीमघाट स्थित शिव मंदिर काफी पुराना होकर आस्था का केंद्र है। मंदिर का शिवलिंग तो मंदिर से भी ज्यादा प्राचीन है। मंदिर एक तरफ होने से यहां एकांत रहता है। मान्यता यह भी है कि अज्ञातवास के दौरान भीम ने भी यहां कुछ समय बिताया था। मंदिर में सच्चे दिल से की गई कामना पूरी होती है। हाईवे के नजदीक होने से यहां पहुंचना काफी आसान है। लेकिन यह घाट जर्जर हो रहा है।

कौरव-पांडवों के जमाने का है विजेश्वर महादेव मंदिर

संद्रैल-बिजवाड़ (देवास)। जिला मुख्यालय से 75 कि मी दूरी पर इंदौरबैतूल नेशनल हाईवे पर बिजवाड़ में विजेश्वर महादेव मंदिर श्रावण में श्रद्धालुओं की आस्था का कें द्र बना हुआ है। किं वंदती है कि विजेश्वर महादेव शिवलिंग रोजाना तिल-तिल कर बढ़ता है। कौरवपांडवों के जमाने का सैकड़ों वर्ष पुराना यह मंदिर पूरी तरह से पत्थरों से बना हुआ है। 151 फीट ऊंचा मंदिर का शिखर कई गांवों से देखा जा सकता है। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां दो शिवलिंग हैं। एक काफी छोटे रूप में यहां स्थापित किया गया था, जो आज इतना वजनी हो चुका है कि अके ला व्यक्ति इसे उठा नहीं सकता। संत प्रत्यक्षानंदजी महाराज मंदसौर, संत भागवतानंदजी महाराज और संत नित्यानंदजी महाराज मैनपुरी आश्रम मंदसौर के माध्यम व ग्रामीणों के सहयोग से यहां धर्मशाला, यज्ञ शाला का निर्माण भी कि या गया है।

बिलपांक का विरुपाक्ष महादेव मंदिर

रतलाम/प्रीतमनगर। जिला मुख्यालय से 15 किमी दूर स्थित बिलपांक के विरुपाक्ष महादेव मंदिर जन-जन की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। यहां वैसे तो वर्षभर जिले सहित अन्य स्थानों के दर्शनार्थियों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन और महाशिवरात्रि के दौरान भीड़ अधिक रहती है। बिलपांक का विरुपाक्ष महादेव मंदिर मौर्य कालीन होकर 64 खंभों पर टीका है। मंदिर की यह विशेषता है कि यहां स्थित खंभे कोई भी अभी तक गिन नहीं पाया है। मालवा क्षेत्र के कई पुरातनविद् व दर्शनार्थी इस मंदिर को 13 ज्योतिर्लिंग भी मानते हैं। वास्तु के हिसाब से मंदिर परिसर देखने लायक है। महाशिवरात्रि पर यहां पर प्रसाद के रूप में महिलाओं को पिलाई जाने वाली खीर से संतान की प्राप्ति होती है।

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