अमृतसर, रमेश शुक्ला 'सफर'। किस्मत अच्छी हो तो खोटा सिक्का भी चल पड़ता है। गोताखोर ने उज्जैन की शिप्रा नदी में मिले जिस खोटे सिक्के को 2008 में मात्र 50 रुपये में बेचा था, उसी खोटे सिक्के की कीमत ब्रिटिश हुकूमत 50 लाख दे रही है।

देश भक्ति में सराबोर अमृतसर के साहित्यकार व सिक्कों के संकलनकर्ता देवदर्द कहते हैं कि मैं भारतीय हूं, ब्रिटिश हुकूमत ने देश में राज किया है। मैं खुशनसीब हूं कि मेरे पास ब्रिटिश हुकूमत का दुर्लभ सिक्का है। 26 फरवरी 2007 को ब्रिटिश म्यूजियम ने भी दावा किया था कि दुनिया में दो ही दुर्लभ सिक्के हैं, एक सिक्का उनके म्यूजियम में है तो दूसरे सिक्के की ब्रिटिश हुकूमत को तलाश है।

यूं मिल गईं दुनिया की सारी खुशियां

देवदर्द के साथ ही उनके बेटे प्रतीक को भी सिक्कों के संकलन का शौक है। बेटा सिक्कों की खोज और सत्यता पर पीएचडी भी कर रहा है। ये सिक्का उन्होंने 2008 में एक गोताखोर से 50 रुपये में खरीदा था। 2010 की बात है। दुर्लभ सिक्को की प्रदर्शनी इस्लामाबाद स्थित आत्म पब्लिक स्कूल में लगानी थी। तैयारियां कर रहे थे, तभी बेटे प्रतीक ने एक किताब में रखी 25 फरवरी 2007 की कटिंग देखी। कटिंग फोटो में एक सिक्के की तस्वीर छपी थी। खबर ब्रिटिश म्यूजियम के हवाले से थी।

खबर में लिखा था कि दुनिया में दो ही दुर्लभ सिक्के हैं। एक उनके पास है, दूसरी की तलाश है। बेटे प्रतीक ने खबर पढ़ने के बाद उन्हें फोन पर बताया कि कटिंग में जो फोटो छपी है, वैसा ही सिक्का उनके पास है। 'बेटे प्रतीक की बात सुनकर मैं दौड़ा-दौड़ा घर पहुंचा। सिक्का देखा, अखबार की कटिंग में छपे सिक्के को फोटो से मिलाया तो दुनिया की सारी खुशियां मिल गई हो। 2010 में इस सिक्के को लेकर ब्रिटिश म्यूजियम से बात की। उन्होंने ब्रिटेन बुलाया। ब्रिटिश म्यूजियम वालों ने सिक्के की पहचान की और 50 लाख कीमत लगाई। कीमत सुनी तो आंखें चौंधिया गईं, लेकिन मैंने संकल्प कर रखा है कि न कोई सिक्का बेचा है न ही बेचूंगा। यह सिक्का तो मेरे लिए धरोहर है।

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