Ramraksha Stotra: हिंदू धर्म के अनुसार अलग -अलग भगवानों की पूजा पूरे विधि विधान के साथ अलग तरीकों से की जाती है और इनका अपना अलग महत्व है। ऐसा माना जाता है कि सभी भगवानों की पूजा का अलग फल मिलता है और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। सभी भगवानों की स्तुति अलग -अलग मंत्रों के साथ की जाती है और सभी मंत्रों का अपना अलग महत्त्व है। ऐसा माना जाता है कि मंत्रों का सही ढंग से जाप करने से कई पापों से मुक्ति मिलने के साथ मोक्ष का द्वार भी खुलता है। ऐसा ही एक मंत्र है राम रक्षा स्तोत्र मंत्र। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति के घर में सुख समृद्धि बनी रहने के साथ धन लाभ भी मिलता है। यह मंत्र लोगों को मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है।

राम रक्षा स्तोत्र

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।।

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं।।

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्। स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।।

रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ । शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज:॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल:।।

जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित:। स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक:।।

करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ । मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय:॥

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु:। ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक:। पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु:।।

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌। स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌॥

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण:। न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि:॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌। नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ । य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय:।।

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ । अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌॥

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर:। तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक:॥

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌। अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु:॥

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ । रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ॥

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ। रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌॥

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा । गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण:।।

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम:।

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: । जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम:।

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित:। अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय:॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ । स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर:।।

रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ । काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌।।

राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌। वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌।।

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:।।

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम। श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।।

श्रीराम राम रणकर्कश राम राम। श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥

Posted By: Sandeep Chourey

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