रामकृष्ण मुले, इंदौर। संन्यासी जीवन के 80 बरस पूरी करने वाली 92 वर्षीय विनीताश्रीजी श्वेतांबर जैन समाज की पहली साध्वी बनी हैं। 12 साल की छोटी उम्र में उनकी दीक्षा दो बार दीक्षा के मुहूर्त टलने के बाद सन् 1939 में गुजरात के पादरा में हुई थी। अनुशासित दिनचर्या का सुखद परिणाम है कि आज भी वे पूर्ण तह स्वस्थ हैं और हर दिन उनके आठ से 12 घंटे स्वाध्याय, ध्यान, साधना और प्रवचन में बीतते हैं।

वैराग्य के पथ पर इतना लंबा जीवन बिताने पर उन्हें साध्वियों के सर्वोच्च महत्तरा पद से भी विभूषित किया गया है। साध्वी विनीताश्रीजी बताती हैं कि उनकी दीक्षा आचार्य विजयशांति सूरीश्वर महाराज के सानिध्‍य में हुई। वे प्रवर्तिनी विचक्षणाश्रीजी की शिष्या बनीं।

जब उन्होंने दीक्षा का निर्णय लिया तब पिता उनके विवाह के लिए वर तलाश रहे थे। आखिर अलग-अलग कारणों से दो बार दीक्षा का मुहूर्त टलने के बाद उन्होंने दीक्षा लेकर साधु जीवन को अपनाया। पिछले दस वर्ष से वे रामबाग दादावाड़ी में हैं।

इससे पहले देशभर में जगह-जगह चातुर्मास हुए। इसके लिए दो लाख किलोमीटर की पद यात्रा की। आज भी उनकी दिनचर्या सुबह 4 बजे से शुरू हो जाती है। उनका जन्म संपन्ना परिवार में हुआ था। सांसारिक पिता रतिलाल एक बड़े किसान और व्यापारी थे। साध्वी विनीतीश्रीजी का सांसारिक नाम विाकुमारी था। उनकी दीक्षा साध्वी तिलकश्रीजी के साथ हुई थी, जिनका देवलोकगमन हो चुका है।

साधु जीवन में उनसे छोटी राजस्थानी की चंद्रकलाश्रीजी

साध्वी विमलायशाश्री बताती हैं कि सबसे लंबा वैराग्य जीवन साध्वी विनीताश्रीजी का है। उनसे छोटी साधु जीवन में राजस्थान में दीक्षित हुई चंद्रकलाश्रीजी हैं। चंद्रकलाश्रीजी अपने साधु जीवन के अब तक 75 साल पूरे कर चुकी हैं। विनीताश्रीजी को वैराग्य के पथ पर साधना के लिए महत्तरा पद से विभूषित किया गया है। यह पद उन्हें आचार्य कैलाश सागर की आज्ञा से दिया गया है।

80वां दीक्षा महोत्सव , नेत्र शिविर भी होगा

जैन श्वेतांबर खरतरगच्छ कल्याण संघ के प्रचार सचिव योगेंद्र सांड ने बताया कि 21 फरवरी को साध्वी विनीताश्रीजी का 80वां दीक्षा दिवस महोत्सव रामबाग दादावाड़ी में मनाया जाएगा। इस मौके पर देशभर से उनके गुरुभक्त दर्शन के लिए जुटेंगे। इस अवसर पर निशुल्क नेत्र शिविर भी आयोजित किया जाएगा। इसमें मोतियाबिंद ऑपरेशन के लिए मरीजों का चयन होगा। शिविर सुबह 9.30 से दोपहर 1 बजे तक होगा।

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