- श्री श्री रविशंकर

मौजूदा समय में बच्चों और माता-पिता के बीच की दूरियां बढ़ गई हैं। बच्चों को जीवन का वास्तविक अर्थ ही नहीं मालूम होता और वे भटक जाते हैं। माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को तनाव से बचने की राह सुझाएं। अभिभावक चाहें तो ऐसा कर सकते हैं।

सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों का सर्वांगीण विकास हो। लेकिन यह तभी संभव है जबकि उन पर बहुत छुटपन से ही ध्यान दिया जाए। किशोरावस्था में बच्चों को माता-पिता के मार्गदर्शन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। यह ऐसा नाजुक दौर होता है जब बच्चे अक्सर भ्रमित हो जाते हैं। इस उम्र में इतनी समझ भी नहीं होती है कि टीनेजर्स अपनी भावनाओं का सैलाब संभाल सकें। घर के सुरक्षित माहौल में रहने वाले बच्चों को इस उम्र में पहली बार बाहरी दुनिया के कठोर यथार्थ का सामना करना पड़ता है।

टीनएज में प्रवेश करते ही परीक्षा से जुड़े तनाव, अपने दोस्तों की तरफ से होने वाली तुलना और भविष्य की चिंता में डूबे बच्चे खुद को बहुत अकेला पाते हैं। सोशल साइट्स पर सक्रिय रहने वाले टीनेजर्स निजी जीवन में बेहद अकेले होते हैं। इस तरह के माध्यमों के सहारे वे अपना अकेलापन दूर करने की कोशिश करते हैं। इस उम्र में हारमोन संबंधी बदलावों के कारण भी किशोरों की मनोदशा में अक्सर उतार-चढ़ाव आता है। इसके कारण वे थोड़े चिढ़चिढ़े भी हो जाते हैं। उन्हें अपने परिवार से यही शिकायत रहती है कि उन्हें कोई नहीं समझ पा रहा है।

माता-पिता की ज्यादा रोकटोक भी किशोरों को विचलित करती है। धैर्य की कमी इस उम्र की बड़ी समस्या है। टीनेजर अपनी हर समस्या का तत्काल हल चाहते हैं। अपने से छोटों का साथ उन्हें अच्छा नहीं लगता और बड़ों के साथ अपनी समस्याएं साझा करने में संकोच होता है। ऐसे समय में अभिभावकों के लिए बहुत जरूरी है कि वे बच्चों का विश्वास जीतने की कोशिश करें। बच्चों को थोड़ी आजादी दें। उन्हें निर्णय लेना सिखाएं और अनियंत्रित इच्छाओं पर लगाम लगाना भी।

किशोरों को एक दिशा और जीवन जीने का कौशल दिया जाना चाहिए। बच्चों का अध्यात्म से साक्षात्कार इस दिशा में अहम हो सकता है। उनका ध्यान प्राणायाम और योग की तरफ खींचने का विशेष रूप से फायदा मिल सकता है।

इससे वे परीक्षा के दौरान होने वाले मानसिक तनाव का मुकाबला भी कर पाएंगे। उन्हें संतुलित आहार लेना सिखाना भी मायने रखता है। दुर्भाग्य यही है कि अध्यात्म को अब तक बेहद ऊबाऊ समझा जाता रहा है। हमें यही सोच बदलनी है। अध्यात्म का हर विषय जीवंत और रोचक हो सकता ह।

वस्तुत: अध्यात्म एक मूल्य आधारित दिशा है जिससे जीवन समृद्ध और आनंदमय होता है। इस दौर में ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं। बच्चों के साथ उनके रिश्तों में दूरियां बढ़ती ही जा रही हैं। इन दूरियों को मिटाने की पहल माता-पिता को ही करना होगी। यह फासला अगर मिट जाता है तो बच्चों और अभिभावकों के बीच प्रेम का झरना बह सकता है। अगर यह मिटता है तो बहुत सारी समस्याओं के हल स्वत: ही निकल आएंगे।

हमारे शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जब बच्चे 16 वर्ष के हो जाएं तो उनके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए। इस उम्र के बाद अपने बच्चों को व्याख्यान या भाषण देने से बचना चाहिए। उनकी समस्याओं को समझें और उन्हें मित्र की तरह सलाह दें। यही बात बच्चों के शिक्षकों पर भी लागू होती है कि उन्हें बच्चों को नियंत्रित करने के अनोखे तरीके ईजाद करने होंगे। उन्हें डांटने या उपदेश देने से बात बनेगी नहीं। जब टीचर बच्चों के साथ मित्र की तरह रहेंगे तब बच्चे उनके साथ ज्यादा चीजें साझा कर पाएंगे।

हाल ही में किए एक सर्वेक्षण में सामने आया कि एक छोटा बच्चा दिन में 400 बार मुस्कुराता है, वहीं एक किशोर 17 बार और व्यस्क तो कभी-कभी ही मुस्कुराते हैं। वे जीवन के तनावों से ही नहीं उबर पाते हैं। यह स्थिति बेहद भयावह है कि नई पीढ़ी तनाव में जी रही है और उसे इस तनाव से बचने के तरीके सीखने होंगे।

मूलत: सभी समस्याएं हमारे मस्तिष्क से ही जन्म लेती हैं। अध्यात्म के पास मन और जीवन को संभालने की व्यावहारिक शक्ति होती है। हम कहीं न कहीं अपने मूल्यों को पोषित करना भूल गए हैं। शिक्षा प्रणाली बच्चों को स्वार्थी या अपने बारे में ही सोचना सिखा रही है।

हमें अपने बच्चों पर थोड़ा भरोसा करने की जरूरत है। उन्हें केवल संसाधन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें उचित जीवन मूल्य भी देने होंगे। बच्चे शुरुआती उमर में केवल भौतिक वस्तुओं का उपभोग सीखते हैं और इस भ्रम को ही जीवन का सत्य समझ लेते हैं। जबकि प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य आतंरिक विकास होना चाहिए।

आतंरिक विकास के लिए अध्यात्म जरूरी है। जब हम उन्हें उनकी शक्तियों और मूल्यों से अवगत कराएंगे तभी उन्हें इस समय की समस्याओं से बचा पाएंगे। तभी वे ज्यादा जिम्मेदार नागरिक भी बनेंगे।

Posted By: Amit

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