प्रयागराज। संगम के तट पर सनातन संस्कृति की सेवा और सांसरिक सुखों से विरक्ति की प्रक्रिया का आगाज हो गया है। 13 अखाड़ों में हजारों लोग संन्यास ग्रहण कर मोक्षमार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं। प्रयाग की पवित्रभूमि पर संन्यास दीक्षा शुरू हो गई है। संन्यास की विभिन्न प्रक्रिया से गुजरते हुए लोग नागा बन रहे हैं। शैव अखाड़ों और वैष्णव अखाड़ों में संन्यासी बनने की प्रक्रिया अलग-अलग है। दोनों ही संप्रदायों में साधु बनने के लिए कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है।

संगम तट पर विभिन्न अखाड़े महापुरुष, ब्रह्मचारी, संन्यासी, नागा और दिगंबर बनाकर अपना कुनबा बढ़ाने में लगे हैं। इस बावत संगमतट पर अनुष्ठान शुरू हो चुका है। इस बार बड़ी संख्या में महिला नागा भी संन्यासी बन रही हैं। जूना अखाड़ा की सभी दस मढिय़ों से करीब एक हजार से अधिक नागा संन्यासी बनाने का अनुष्ठान शुरू हो चुका है।

वैसे सभी अखाड़ों से करीब 5000 से अधिक संन्यासी और ब्रह्मचारी बनने हैं। इसके लिए हरिद्वार से 50 से अधिक नाई बुलाए गए हैं। संस्कार की सामग्री भी हरिद्वार से ही लाई गई है। अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वर सभी को अंतिम दीक्षा देंगे। पांटून पुल चार स्थित गंगा तट पर दीक्षा की व्यवस्था है। यह दीक्षा अखाड़ों के ध्वज के नीचे पूरी रात चलेगी।

कुंभ में नए लोगों को दीक्षा देने की परंपरा

कुंभ पर्व पर ही अखाड़े नए लोगों को दीक्षा देने की परंपरा रही है। कुछ लोग जो पूर्व में दीक्षित हो चुके है उनको परखने के बाद ब्रह्मचारी, संन्यासी या नागा बना दिया जाता है। कुंभ पर्व में अखाड़े अपनी संख्या बल में बढ़ोतरी करते हैं। महामंडलेश्वर की पदवी दी जाती है। मौनी अमावस्या के पहले अखाड़े में दीक्षा का कार्यक्रम होता है।

जूना अखाड़ों के कुंभ प्रभारी महंत विद्यानंद सरस्वती ने बताया कि शैव अखाड़ों में नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया बहुत कठिन है। संन्यासी बनने की पहली शर्त है कि उस व्यक्ति को कोई शारीरिक विकृति नहीं होनी चाहिए। उम्र का बंधन भी रखा गया है। 16 से 20 वर्ष की आयु होनी चाहिए। दीक्षा के समय उसके शरीर पर शीरा एवं धनिया लपेटा जाता है। सिर का मुंडन करने के बाद उसे महापुरुष की उपाधि की दी जाती है।

नवदीक्षितों का कोई व्यक्तिगत गुरु नहीं होता है। वरिष्ठ नागा संन्यासी इन्हें दीक्षित करता है। दीक्षा देने के बाद इन्हें भ्रमणकारी नागाओं के साथ भेजा जाता है। इसके साथ उन्हें सफाई, भोजन पकाना, पूजा पाठ करना, नागफनी बजाना और अस्त्रों के प्रयोग का प्रशिक्षण दिया जाता है। नागा जब इनके काम से संतुष्ट हो जाते हैं आगे की दीक्षा दी जाती है।

नागा बनने को पहले तंग तोड़ फिर टंग तोड़ संस्कार

नागा संन्यासी बनने के लिए पहले तंग तोड़ फिर टंग तोड़ संस्कार से गुजरना पड़ता है। टंग तोड़ संस्कार के बाद संन्यासी दिगंबर नागा बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। हालांकि इस संस्कार के तीन वर्ष बाद होने वाले आगामी कुंभ में उसे दिगंबर बना दिया जाता है। यानी संन्यासी हमेशा निर्वस्त्र रहता है। भभूत ही उसके शरीर का वस्त्र बन जाता है।

महंत विद्यानंद सरस्वती बताते हैं कि नागा दिगंबर बनने के लिए नागा गुरु उसे अखाड़े के ध्वज के पास ले जाएगा। वहां उसका तंग तोड़ संस्कार होगा। इस संस्कार के बाद वह घर नहीं जा सकता है।अखाड़े के महंत उसे छह प्रतिज्ञा कराते हैं जिसमें उसे किसी प्रकार की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार नहीं होता है। जो संपत्ति है वह नागा समुदाय की हो जाती है। व्यक्तिगत कोई वस्तु न छिपाओ अथवा रखो। अपने मूल अखाड़े को न छोड़ो। किसी से लड़ो झगड़ो नहीं। मादक पदार्थों का सेवन न करो। अपने से श्रेष्ठ की आज्ञा की अवज्ञा न करो।

तीन साल बाद महापुरुष से बनते नागा

प्रतिज्ञा के साथ मंत्र द्वारा दीक्षा दी भी जाती है। फिर वह अपना श्राद्ध अनुष्ठान कर पलाश के दंड का त्याग कर देता है। तंग तोड़ संस्कार के बाद नागा संन्यासी को तीन दिन उपवास रखना पड़ता है। फिर सुबह तीन बजे अखाड़े के भाले के समक्ष साधक गुरु उसके सिर पर जल डालता है। इसके बाद एक खास प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिससे वह टंग तोड़ बन जाता है। इस प्रक्रिया के बाद उसको तीन वर्ष तक परखा जाता है। फिर अगले कुंभ में वह वस्त्रधारी नागा साधु से पूरी तरह नागा बन जाता है। महापुरुष से नागा बनने में तीन से 12 वर्ष लग जाते हैं।

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