ओशो।

मैंने सुना है, एक अमरीकन चर्च में एक संध्या एक नीग्रो प्रार्थना करने को गया। उसने द्वार खटखटाए, पादरी ने झांक कर देखा, क्योंकि पादरी हमेशा झांक कर देख लेते हैं कि परमात्मा से जो मिलने आया है, वह परमात्मा की जाति का है या नहीं? क्योंकि परमात्मा की बहुत जातियां हैं। देखा कि काली चमड़ी का आदमी है, पुराने दिन होते, तो उस पंडित ने, उस पुरोहित ने, उस ब्राह्मण ने धक्के देकर निकलवाया होता और पश्चाताप करवाया होता। लेकिन दिन थोड़े बदल गए हैं, तो उसने प्रेम से उसे समझाने की कोशिश की कि व्यर्थ चर्च आने की क्या जरूरत है?

मन को पवित्र करो, प्रार्थना करो, आराधना करो, और जब तक मन पवित्र नहीं होगा, तो चर्च में आने से क्या फायदा? जैसे कि जो सफेद चमड़ी के लोग वहां आते थे, वे सब मन पवित्र करके आते हों। लेकिन उनसे ये उसने कभी नहीं कहा था। आज उस नीग्रो को यह कहा, वह सीधा आदमी होगा। इसीलिए तो मंदिर की तलाश में गया था। वापस लौट गया यह बात मान कर।

दो-चार दिनों के बाद रास्ते पर उस पादरी को वह नीग्रो फिर मिला, उस पादरी ने पूछा तुम दिखाई नहीं पड़े दोबारा? उस नीग्रो ने कहा मैंने आपकी बात मान कर रात जाकर प्रार्थना की, बड़े प्रेम से भर कर प्रार्थना की, रात सपने में परमात्मा प्रकट हुआ और मुझसे बोला पागल, तू किसलिए उस चर्च में जाना चाहता है, तू इस भूल में मत पड़, दस साल से मैं खुद ही कोशिश कर रहा हूं, उस पादरी ने मुझे ही नहीं घुसने दिया, तो तुझे क्या घुसने देगा? इसलिए फिर मैंने सोचा कि जहां परमात्मा भी घुसने में असफल हो गया, वहां मुझ गरीब की क्या हैसियत, मैंने फिर खयाल छोड़ दिया।

परमात्मा ने अतिश्योक्ति से बचने के लिए दस वर्ष कह दिए होंगे। सच्चाई तो यह है कि दस हजार वर्षों से घुसने की कोशिश जारी है, अब तक किसी मंदिर और मस्जिद में परमात्मा पहुंच नहीं पाया। वहां सब शैतान के पहरेदार द्वारों पर खड़े हैं। वहां शैतान ने बहुत पहले, इसके पहले कि परमात्मा घुसता कब्जा कर लिया है। और नहीं तो धर्मों के नाम पर जो हुआ, वह नहीं हो सकता था।

धर्म एक सांप्रदायिक मताग्रह बन गया, और अंधों के हाथ में तो सारी बात उपद्रव की होनी स्वाभाविक थी। इसलिए मैं यह प्रार्थना करना चाहता हूं, इस चर्चा के प्रारंभ में ही, धर्म मेरे लिए एक चिकित्सा है आंखों की। धर्म का कोई संबंध सिद्धांतों से नहीं है। धर्म का कोई संबंध प्रकाश के संबंध में लिखे गए, शास्त्रों से नहीं है। धर्म का कोई संबंध प्रकाश के संबंध में प्रतिपादित सिद्धांतों से, शब्दों से, थीसिस से नहीं है।

धर्म का संबंध है प्रत्येक व्यक्ति की आंखें जो करीब-करीब बंद हैं, वे कैसे खुल जाएं। सत्य को समझा नहीं जा सकता, सत्य को देखा जा सकता है। फिर से दोहराता हूं, सत्य को समझा नहीं जा सकता, सत्य को देखा जा सकता है। सत्य को वैचारिक रूप से नहीं, नहीं, सत्य की कोई धारणा वैचारिक रूप से नहीं बनाई जा सकती। लेकिन सत्य को अनुभव किया जा सकता है। सत्य के संबंध में विचार की कोई गति नहीं, लेकिन आंख की गति है।

इसलिए पहली बात धर्म एक चिकित्सा है, एक उपचार है।

यह उपचार कैसे हो? इस उपचार की विधि की बाबत थोड़ी बात करने से पहले प्राथमिक रूप से ही यह जान लेना जरूरी था, इसलिए मैंने कहा कि अधिक लोग जो भी सत्य की खोज में अनुप्रेरित होते हैं, और ऐसा कौन मनुष्य है, जिसमें जीवन हो, जिसके प्राणों में स्पंदन हो? और जिसके हृदय में कभी न कभी जीवन के सत्य को जानने की आकांक्षा पैदा न हो जाती हो। ऐसा कौन सा मनुष्य है, जो जीवन के अर्थ को और अभिप्राय को जानने को अनुप्रेरित न हो जाता हो। ऐसा कौन सा मनुष्य है, जो यह न जान लेना चाहता हो कि वह क्यों है, और किसलिए है? और इस सारी जीवन यात्रा का कोई अर्थ है, या सब अर्थहीनता है?

निश्चित ही हर एक के मन में यह प्यास किसी न किसी दिन पैदा होती है। लेकिन यह प्यास पैदा होते से ही भटक जाती है, भटक जाती है इसलिए कि वह सत्य के संबंध में विचार करने लगता है। सत्य के संबंध में सब विचार अंधे के टटोलने से ज्यादा की उनकी कोई स्थिति नहीं है। और उस टटोलने में अगर कुछ बातें बहुत सम्यक, बहुत संगत, बहुत कोहरेंट भी मालूम पड़ें, तो भी वह संगति केवल विचार की है, कल्पना की है, सत्य से उसका कोई वास्ता नहीं है।

Posted By: Lav Gadkari

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