मनुष्य का जीवन जन्म से उपलब्ध नहीं होता है। जन्म के बाद तो अवसर मिलता है कि हम जीवन का निर्माण करें। लेकिन जो लोग जन्म को ही काफी समझ लेते हैं उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है। जन्म के बाद जिस जीवन को हम वास्तविक जीवन मान लेते हैं वह धीरे- धीरे मरते जाने के सिवाय और कुछ भी नहीं है।

उसे जीवन कहना भी कठिन है। जो ठीक-ठीक जानते हैं वे उसे धीमी मृत्यु ही कहेंगे। जन्म के बाद तुम्हें स्मरण होना चाहिए कि हम रोज-रोज धीरे- धीरे मरते जाते हैं। मृत्यु अचानक नहीं आती है, वह एक लंबा विकास है। जन्म के बाद अगर कोई व्यक्ति सत्तर वर्ष जीता है, तो सत्तरवें वर्ष पर अचानक मृत्यु नहीं आ जाती है।

मृत्यु रोज-रोज बढ़ती जाती है और सत्तरवें वर्ष पर पूरी हो जाती है। रोज हम मर रहे हैं। एक दिन जिसको हम जी लेते हैं, वह हमारी उम्र से समाप्त हो जाता है। तो लंबे क्रम को हम समझ नहीं पाते कि यह मरने का क्रम है। लेकिन वस्तुत: यह मरने का ही क्रम ही है।

अगर इसी को हमने जीवन समझ लिया तो हम भूल में पड़ जाएंगे। यह जीवन नहीं है। यह जो हमें प्राप्त है वह सत्तर वर्ष की धीमी-धीमी मृत्यु है। तो अगर यह जीवन नहीं है तो फिर जीवन और क्या है? जीवन कुछ और अलग बात है। स्वयं के भीतर किसी ऐसे तत्व के दर्शन हो जाएं जिसकी मृत्यु नहीं होती है तो ही समझना चाहिए कि हमने जीवन को जाना, जीया, पहचाना। हम जीवित हुए।

अन्यथा ऐसे सामान्यतया हम जीवित नहीं हैं।

बुद्ध के समय में लाखों लोग उनके निकट जाकर सत्य की खोज के लिए भिक्षु हो गए थे। एक दिन एक भिक्षु सुबह-सुबह बुद्ध के पास गया। बुद्ध ने उससे पूछा- 'तुम्हारी उम्र क्या है?"

उस भिक्षु ने कहा- 'केवल पांच वर्ष।"

आस-पास के भिक्षु भी हैरान हुए! वह कोई पैंसठ वर्ष का था। बुद्ध भी हैरान और चकित हुए! उन्होंने पूछा - 'कुछ भूल हुई या तो तुम्हारे कहने में या मेरे सुनने में। कितनी उम्र है तुम्हारी?"

उसने फिर कहा-'केवल पांच वर्ष।"

बुद्ध ने कहा - 'मैं समझा नहीं। तुम किस भांति उम्र की गणना करते हो?

उस वृद्ध ने कहा - इधर पांच वर्ष से ही मैंने जीवन को जाना। उसके पहले जो जीवन था आज मैं समझता हूं वह जीवन ही नहीं था। खाना-पीना, सो लेना काम कर लेना पर्याप्त नहीं है जीवित होने के लिए। जीवन तो एक बहुत गहरी अनुभूति का नाम है। किसी अमृत, किसी ऐसे तत्व को जान लेना जिसकी मृत्यु न हो, तब तक जीवन नहीं है।"

तो जिसे हम समझते हैं इसे जीवन नहीं कहा जा सकता। यह तो जीवन की प्रतीक्षा है। धीमे-धीमे एक दिन मृत्यु आएगी और समाप्त कर देगी।

जो व्यक्ति किसी सत्य की खोज में नहीं लगता है वह व्यक्ति क रीब-करीब अवसर को व्यर्थ खो देता है। उसके हाथ से समय व्यर्थ हो जाता है। और जो समय चला जाता है वह लौटता नहीं है। क्या करें उसे वापस लाने का कोई उपाय ही नहीं है।

जो मैंने कहा- यह जो हमारी धीमी- धीमी मृत्यु है इस मृत्यु में कैसे शांति हो सकती है? अगर तुम्हें मैं बता दूं कि सुबह तुम्हारी किसी की भी मृत्यु हो जाएगी फिर रात उसे शांति हो सकती है? सुख हो सकता है? फिर रात उसे आनंद हो सकता है? फिर उसे भोजन अच्छा लगेगा?

फिर उसे कपड़े अच्छे लगेंगे? स्मरण रखो जो व्यक्ति यह जान लेता है कि मुझे मर जाना है उसके जीवन में क्रांतिकारी अंतर हो जाते हैं, उसकी दृष्टि में, उसके सोचने में अंतर हो जाते हैं, उसके विचार करने में, उसके व्यवहार करने में अंतर हो जाते हैं।

जो व्यक्ति इस बात को भूले रहता है कि हम इस जमीन पर मरने के लिए हैं उसके जीवन में पवित्रता फलित नहीं होती, उसके जीवन में धर्म नहीं होता। उसके जीवन में, जिसको हम कहें ईश्वर का मार्ग, वह नहीं होता है।

यह मैंने तुमसे इसलिए कहा है कि इस जीवन को जीवन मत समझना यह तो मरने के लिए प्रतीक्षा है। जैसे कोई क्यू (कतार) में खड़ा हो किसी बस में बैठने के लिए। कोई आगे है कोई पीछे है कोई बिल्कुल पीछे है लेकिन सारे लोग क्यू में खड़े हैं बस थोड़ी देर में आएगी धीरे-धीरे लोगों को ले जाएगी। ठीक वैसे ही हम सारे लोग एक क्यू में खड़े हुए हैं मृत्यु के लिए। जो आगे हैं वे आगे चले जाएंगे फिर एक-एक आदमी उस क्यू में से मृत्यु लेता चला जाएगा। हम सब प्रतीक्षारत हैं। और मृत्यु से कोई फर्क नहीं पड़ता वह सात दिन बाद आए या सत्तर वर्ष बाद आए, वह आनी है!

तो क्या हम कोई रास्ता खोज सकते हैं कि मृत्यु से बच जाएं? क्या कोई रास्ता हो सकता है? क्या कोई मार्ग हो सकता है कि मृत्यु के भय से हम मुक्त हो जाएं? धर्म इसी बात की खोज है। धर्म का संबंध ईसाई मुसलमान, हिंदू, जैन इससे नहीं है।

धर्म का संबंध इस बात से है कि हम अपने भीतर मरने वाले तत्व को तो जानते हैं- हमारा शरीर है यह मर जाएगा। लेकिन क्या शरीर ही सब-कुछ है? या हमारे भीतर आत्मा जैसी कोई चीज भी है जो कि नहीं मरेगी? इसे कौन बताएगा, जब तक कि हम खुद अपने भीतर खोजने नहीं जाएंगे।

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