ओशो

सत्य के लिए जिसकी अभिप्सा है, वह जाने कि उसे सत्य की कोई कल्पना, कोई धारणा स्वीकार नहीं करनी है। उस स्वीकार पर ही साधना का आत्मघात हो जाता है। सत्य को पाने के लिए चित्त के द्वारा दिये गए सारे प्रलोभनों को छोड़ने का साहस चाहिए। चित्त द्वारा प्रदत्त कोई भी विकल्प स्वीकार नहीं करना है।

तभी वह निर्विकल्प अवस्था आती है, जो स्वयं के समक्ष स्वयं के प्रत्यक्ष को देती है। वह अंतत: प्रत्यक्ष, शुद्ध ज्ञान की सद्-घड़ी आ सके, उसके पूर्व बहुत-कुछ आता है जो कि सत्य नहीं है। और उसमें जो उलझता है, वह और कुछ भी जान ले, स्वयं को नहीं जानता है।

स्वयं को कभी भी ज्ञेय की भांति नहीं जाना जाता है। इसलिए, जब तक कुछ भी ज्ञेय शेष है, तब तक जानना कि साक्षात 'पर" का है, 'स्व" का नहीं। ज्ञेय जब अशेष है, तब जो शेष रह जाता है, वही ज्ञान है, वही स्व है, वही सत्य है।

रिंझाई ने कहा है, 'समाधि के मार्ग में यदि स्वयं भगवान भी मिलें, तो उन्हें राह से दूर कर देना।" मैं भी यही कहता हूं। समाधि की राह जब पूर्ण निर्जन है और ज्ञान की धारा में जब कोई ज्ञेय नहीं है, और दर्शन को, देखने को जब कुछ शेष नहीं है, तभी वह मिलता और जाना जाता है, जो कि सत्य है।

एक सद्गुरु ने भी एक दिन यही कहा था। उसके एक शिष्य ने सुना। उसने अपनी कुटिया पर लौट सारी मूर्तियां तोड़ डालीं और सारे ग्रंथ जला डाले। और जाकर अपने गुरु से कहा कि मैं वह सब नष्ट कर आया हूं, जो कि सत्य के आगमन में बाधक हैं। उसका गुरु उसकी बात सुन बहुत हंसने लगा था और उसने कहा था, 'पागल, उन ग्रंथों को जला, जो तेरे भीतर हैं और उन मूर्तियों को तोड़, जो तेरे चित्त की अतिथि बन गयी हैं।"

ऐसा ही आज यहां हुआ है। एक युवक मेरी बातें सुन अपने पूजागृह को उजाड़ मूर्तियों को कुएं में फेंक आये हैं। उनसे मैंने कहा है, 'मूर्तियों को नहीं, उस मन को फेंको, जो कि मूर्तियों का निर्माता है। पूजागृहों को उजाड़ने से क्या होगा, जब तक कि यह सर्जक मन जीवित है, जो कि प्रतिक्षण नये पूजागृह बना लेता है?"

Posted By: Sandeep Chourey

  • Font Size
  • Close