ओशो

मनुष्य की सत्य की खोज में जो सबसे बड़ी बाधा है, अक्सर तो उस बाधा की ओर हमारा ध्यान भी नहीं जाता, और फिर जो भी हम करते हैं वह सब मार्ग बनने की बजाय मार्ग में अवरोध हो जाता है। एक अंधे आदमी को यदि प्रकाश को जानने की कामना पैदा हो जाए, यदि आकांक्षा पैदा हो जाए कि मैं भी प्रकाश को और सूर्य को जानूं, तो वह क्या करे? क्या वह प्रकाश के संबंध में शास्त्र सुने? क्या वह प्रकाश के संबंध में सिद्धांतों को सीखे?

क्या वह प्रकाश के संबंध में बहुत उहापोह और विचार में पड़ जाए? क्या वह प्रकाश की कोई फिलासफी, कोई तत्वदर्शन, अपने सिर से बांध ले? क्या इस भांति उसे प्रकाश का दर्शन हो सकेगा? नहीं जिस अंधे को प्रकाश की खोज पैदा हुई हो, उसे प्रकाश के संबंध में नहीं, अपने अंधेपन के संबंध में, अपने अंधेपन को बदलने के संबंध में निर्णय लेने होंगे।

प्रकाश को जानना हो, तो आंखों के संबंध में कुछ करना पड़ेगा। प्रकाश के संबंध में कुछ भी नहीं। लेकिन यदि वह प्रकाश के संबंध में कुछ करने में लग जाए, तो वह शक्ति और श्रम व्यर्थ जाएगा क्योंकि उसी शक्ति और श्रम से आंखें भी खुल सकती थीं। सामान्यत: यही होगा, चक्षुहीन को जब भी प्रकाश के संबंध में कोई खयाल और कामना पैदा होगी, तो वह प्रकाश के संबंध में श्रम करना शुरू कर देगा।

ऐसा सभी श्रम व्यर्थ है, ऐसा सभी श्रम सार्थक नहीं है। सार्थक होगी यह खोज कि वह आंख के संबंध में कुछ करे। इसलिए धर्म को मैं विचार नहीं कहता हूं, कहता हूं उपचार। धर्म कोई वैचारिक खोज नहीं है, बल्कि आत्मचिकित्सा है, बल्कि स्वयं का उपचार है। धर्म कोई वैचारिक तत्व ज्ञान की बात नहीं, बल्कि भीतर बंद आंखों को खोलने का मार्ग और पद्धति है। इन अर्थों में धर्म स्वयं ही एक विज्ञान है। उपचार है इसलिए।

रामकृष्ण एक छोटी कथा कहा करते थे। एक गांव में एक अंधा आदमी था, उसके मित्रों ने एक दिन उसे भोजन पर आमंत्रित किया। उसे भोजन में कुछ चीजें पसंद आईं। उसने पूछा कि यह कैसे बनीं? उसके मित्रों ने कहा - दूध से बनी हैं। उस अंधे ने कहा मैं जानना चाहूंगा दूध कैसा होता है? ठीक था उसका पूछना।

उसके पूछने में तो कोई गलती न थी, लेकिन मित्र पंडित रहे होंगे, उन्होंने समझाना भी शुरू कर दिया। उन मित्रों ने दूध के संबंध में भी समझाना शुरू कर दिया कि दूध कैसा होता है? एक मित्र ने कहा कि तुमने नदी पर उड़ता हुआ बगुला देखा होगा, उसके जैसे सफेद, शुभ्र पंख होते हैं, वैसा ही दूध का रंग होता है। वह अंधा बोला, मुझसे मजाक न करें, मैंने तो बगुला देखा नहीं, और शुभ्र रंग क्या है, यह भी मुझे पता नहीं।

तो मेरी पहली समस्या तो वहीं खड़ी है कि दूध कैसा होता है? एक दूसरी समस्या और खड़ी हो गई कि यह सफेद रंग क्या होता है? और तीसरी और खड़ी हो गई कि यह बगुला क्या होता है? आपके उत्तर ने मुझे और कठिनाई में डाल दिया।

मित्र परेशान हुए, एक दूसरे मित्र ने समझाने की कोशिश की कि बगुला कैसा होता है? उसने अपने हाथ को उस अंधे के करीब ले गया और कहा मेरे हाथ पर हाथ फेरो, जैसा मेरा हाथ मुड़ा हुआ है, ऐसी ही बगुले की गर्दन होती है। उस अंधे आदमी ने उसके हाथ पर हाथ फेरा, और खुशी से उसकी आंखों में आंसू आ गए।

और वह बोला कि मैं समझ गया कि दूध कैसा होता है? मुड़े हुए हाथ की तरह। ठीक ही उसने कहा, ठीक ही उसका निष्कर्ष है। उसमें अंधे आदमी की कोई भी भूल नहीं। भूल है उन आंख वालों की जिन्होंने उसे आंख न रहते हुए प्रकाश और रंग और वस्तुओं के संबंध में कुछ समझाने की कोशिश की।

मनुष्य का मन इधर हजारों वर्षों में सुलझा नहीं है और उलझ गया है। दया है उन दार्शनिकों की और पंडितों और विचारकों की जिन्होंने आत्मा और परमात्मा और सत्य के संबंध में बहुत से विचार दे दिए। और हमारे हाथों में उनका वही हाल हुआ है, जो उस अंधे के हाथों में हुआ। उसने समझा कि मुड़े हुए हाथ की तरह दूध होता है। हमारी भी परमात्मा और आत्मा, और सत्य के संबंध में जो समझ है, वह इससे भिन्ना नहीं है।

यही तो वजह है कि ये सत्य को समझने वाले लोग आपस में लड़ते हैं। एक दूसरे की हत्या भी करते हैं। एक दूसरे के विरोध में भी जीवन लगाते हैं। और ये सत्य को समझने वाले लोग ही संप्रदाय खड़े करते हैं और मनुष्य-जाति को आपस में खंडित करते हैं और युद्ध में खींचते हैं। धर्मों के नाम पर जो हुआ है, वह सभी कुछ हमें ज्ञात है, निश्चित ही सत्य की यह समझ किसी अंधे आदमी की समझ होगी।

अन्यथा सत्य तो सौंदर्य को लाने वाला, जीवन में संगीत को लाने वाला बनता, सत्य तो मनुष्य-जाति को परमात्मा के निकट ले जाने वाला बनता, लेकिन ये तथाकथित सत्य की बातें और इनके केंद्र पर बने हुए संगठन और संप्रदाय, परमात्मा तो बहुत दूर पड़ोसी से भी जोड़ने में समर्थ नहीं हो सके हैं। इन्होंने पड़ोसी से भी पड़ोसी को तोड़ दिया है। और जो पड़ोसी को पड़ोसी से तोड़ देता हो, वह परमात्मा से जोड़ सकेगा यह असंभव है।

Posted By: Sandeep Chourey

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