ओशो

मित्रता संबंध है। तुम कुछ लोगों के साथ संबंध बना सकते हो। मैत्री गुणवत्ता है न कि संबंध। इसका किसी दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं है, मौलिक रूप से यह तुम्हारी आंतरिक योग्यता है। जब तुम अकेले हो तब भी तुम मैत्रीपूर्ण हो सकते हो। मैत्री एक तरह की खुशबू है। जंगल में फूल खिलता है, कोई भी नहीं गुजरता, तब भी वह खुशबू बिखेरता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई जानता है या नहीं, यह उसका गुण है।

संबंध एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच ही बन सकता है या अधिक से अधिक मनुष्य और जानवर के साथ-घोड़ा, कुत्ता। लेकिन मैत्री चट्टान के साथ, नदी के साथ, पहाड़ के साथ, बादल के साथ, दूर के तारों के साथ भी हो सकती है। मैत्री असीम है क्योंकि यह दूसरों पर निर्भर नहीं है, यह पूरी तरह से आपकी अपनी खिलावट है।

इसलिए, मैत्री बनाओ, बस मैत्री सारे अस्तित्व के साथ। और उस मैत्री में तुम वह सब पा लोगे जो पाने योग्य है। मैत्री में तुम आत्यंतिक मित्र पा लोगे।

इस संबंध में मुझे मैक्यावली का स्मरण होता है, जिसने विश्व के राजकुमारों को मार्गदर्शन किया है उसकी महान किताब 'दि प्रिन्स" में। उनमें से एक परामर्श यह था: ऐसी कोई बात अपने मित्र को मत बताओ जो कि तुम अपने शत्रु को नहीं बता सकते क्योंकि वह व्यक्ति जो आज मित्र है, कल शत्रु बन सकता है। और उन परामर्शों में से एक परामर्श यह भी था कि अपने शत्रु के संबंध में भी ऐसा मत बोलो, जो उसके विरोध में हो, क्योंकि शत्रु भी कल मित्र बन सकता है। तब तुम्हारे लिए स्थिति काफी अजीब होगी।

मैक्यावली की यह साफ अंतर्दृष्टि है कि हमारा साधारण प्रेम नफरत में बदल सकता है, हमारी मित्रता किसी भी क्षण शत्रुता में बदल सकती है। यह आदमी के मन की अचेतन दशा है, यहां प्रेम के पीछे नफरत छिपी होती है। यहां तुम उस व्यक्ति को भी घृणा करते हो, जिनसे तुम्हें प्रेम है, पर इसके प्रति अभी तुम्हारी सजगता नहीं है।

मैत्री केवल तब ही संभव बन सकती है जब तुम वास्तविक और प्रामाणिक होते हो और जब तुम स्वयं के प्रति पूर्ण रूप से सजग होते हो। और इस सजगता में से यदि प्रेम निकलता है तो वह मैत्री है। और यह जो मैत्री है वह कभी भी विपरीत में नहीं बदलती। ध्यान रहे, यह कसौटी है, जीवन के महानतम मूल्य है केवल वे ही हैं जो विपरीत में नहीं बदलते; सच तो यह है कि यहां कुछ भी विपरीत नहीं है।

Posted By: Sandeep Chourey

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