ओशो

एक अच्छे से अच्छा मकान बना कर भी मन तृप्त नहीं होता। धन इकट्ठा करके भी मन तृप्त नहीं होता। सब पा लो, फिर भी मन तृप्त नहीं होता। मन कहता है, कुछ और, कुछ और। मन कहे ही चला जाता है, कुछ और। कुछ उसकी और गहरी खोज की, वह आकाश की यात्रा पर भी जाना चाहता है। ये आधी-आधी भूलें हो चुकी हैं। हमें समझ लेना चाहिए कि हमें अपने मंदिर के शिखर के नीचे, मंदिर के कलश के नीचे पत्थरों की नींव भी बनानी है।

एक बात कि हमें पत्थर की नींव पर स्वर्ण के कलश चढ़ाने हैं।

भारत को शरीर की, पदार्थ की, भूत की पूरी चिंता करनी पड़ेगी। हमने चिंता ही नहीं की है, इसलिए जिम्मा ज्यादा है। पांच हजार वर्ष में जो चिंता होनी चाहिए थी, वह हमें पचास वर्ष में पूरी करनी है। अगर पचास वर्ष में वह हम पूरी नहीं कर पाते तो शायद फिर जगत की दौड़ में हम कभी भी ठीक-ठीक साथ खड़े नहीं हो पाएंगे।

पांच हजार वर्ष का लंबा इतिहास हमें पचास वर्ष में तीव्रता से पूरा कर लेना है। उस तीव्रता से पूरा करने के लिए कुछ आधार बिंदु खोजने होंगे। तो मैं भारत के युवकों से कुछ आधार बिंदु की निरंतर बात करता हूं। दो तीन आधार बिंदु आप से भी कहना चाहूंगा।

पहली तो बात यह है कि जिंदगी विरोध से बन कर निर्मित हुई है। हमारा मन करता है कि विरोध से एक का चुनाव कर लें। जिंदगी विरोध से ही निर्मित है- कभी किसी मकान का दरवाजा देखा है, तो वहां दोनों तरफ से ईंटें लगाते हैं हम, उलटी ईंटें लगाते हैं दरवाजे पर आर्च बनाने को। दोनों तरफ की ईंटें जाकर बीच में जुड़ जाती हैं और मकान के सारे बोझ को झेल लेती हैं, विरोधी ईंटें! कोई कह सकता है कि एक सी ईंटें लगाएं तो हर्ज क्या है! एक सी ईंटें लगाएं तो मकान गिर जाएगा। विरोधी ईंटों के दबाव और तनाव पर मकान खड़ा होता है।

जिंदगी का सारा मकान विरोधी ईंटों से बना है। अगर हमने एकतरफा विचार किया और एक-सी ईंटें लगा दीं तो मकान गिरेगा। अब तक हम इसी भाषा में सोचते रहे हैं कि एक तरह की ईंट ही होनी चाहिए। अगर उपनिषद हम लिखेंगे तो उपनिषद ही लिखेंगे हम अगर हम आत्मा की बात करेंगे, तो आत्मा की ही बात करेंगे दूसरे को हम इनकार कर देंगे। इसलिए हमने जगत को इनकार कर दिया था।

इनकार करने से कुछ इनकार नहीं होता है। जगत है, बहुत मजबूती से है, बहुत पूरी तरह से है। हमारा इनकार भी कहता है कि जगत है। इनकार करना पड़ता है उसे ही, जो है, अन्यथा इनकार की भी कोई जरूरत न रह जाए। हम कितना ही इनकार करें, वह मौजूद है। हम कितनी ही माया कहें, वह मौजूद है।

हम कितना ही असार कहें, वह मौजूद है। असार कहने से हिंदुस्तान एक हजार साल की गुलामी से नहीं बच सका। हमला होगा तो गुलामी आएगी। गुलामी बहुत सत्य है। असार कहने से हिंदुस्तान का संन्यासी भूखा नहीं रह सकता, रोटी खानी पड़ेगी। पेट बहुत वास्तविक है, उसकी भूख बहुत वास्तविक है।

माया कहने से जिंदगी से इनकार नहीं होता, सिर्फ जिंदगी को सम्हालने से इनकार हो जाता है। जिंदगी तो चलती है अपने रास्ते पर, वह है। लेकिन अगर हमने इनकार कर दिया, असार कह दिया, व्यर्थ कह दिया, तो जिंदगी के जिन राजों को हम खोल कर जिंदगी को ज्यादा सुंदर और सुखद बना सकते थे, वे राज हम खोजना बंद कर देंगे। इसलिए पांच हजार वर्षों में अब माया में विज्ञान कैसे खड़ा हो! अगर हमने कह दिया, सब माया है तो विज्ञान का क्या मतलब है। कैसे विज्ञान खोजेंगे हम?

जगत को हम सत्य मानेंगे तो विज्ञान का जन्म होगा। क्योंकि सत्य के ही नियम हो सकते हैं, स्वप्न के तो कोई नियम नहीं हो सकते हैं। झूठ के तो कोई नियम नहीं हो सकते। पांच हजार वर्ष में इतने प्रतिभाशाली लोग हमने पैदा किए, लेकिन एक बड़ा वैज्ञानिक पैदा नहीं किया! इसे भविष्य में सोच लेना पड़ेगा।

बुद्ध जैसा आदमी पैदा किया, महावीर, कृष्ण और राम और शंकर और नागार्जुन और दिग्नाद। हमने एक से एक प्रतिभाशाली लोग पैदा किए। लेकिन, इनमें से एक भी वैज्ञानिक नहीं था। वैज्ञानिक हम पैदा न कर पाए, एक आइंस्टीन पैदा न कर पाए! इसलिए क्योंकि हमने जीवन में संघर्ष को नकारा। अब हमें वैज्ञानिक पैदा करने होंगे, तभी तो जीवन को संतुलन दे पाएंगे।

Posted By: Sandeep Chourey

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