कुंभनगर। जूना अखाड़ा से बुधवार को 100 महिला संन्यासी जुड़ गईं। देर रात्रि तक चले संस्कार में महिलाओं ने अपना पिडदान कर नया जन्म लिया। चौबीस घंटे निराहार रहकर सबने ओम नमः शिवाय का जप किया। मुंडन कराया। रात्रि में गंगा में 108 डुबकी लगाई। अखाड़े के पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि से दीक्षा ली और संन्यासी बन गईं।

कुंभ में जूना अखाड़ा ही महिलाओं को संन्यास की दीक्षा देता है। महिलाओं को नागा संन्यासी नहीं बनाया जाता। सुबह जूना अखाड़ा से महिला विग की प्रमुख महंत आराधना गिरि के सानिध्य में सौ महिला साधु ओम नमः शिवाय का जप करती हुईं कतारबद्ध होकर पांटून पुल चार के पास स्थित आचार्य गद्दी पर पहुंचीं। सबका यहां मुंडन हुआ। सबने डुबकी लगाई। पंडितों ने पूजन कराया। सबको कुल्हड़ एवं दंड और पिडदान की सामग्री दी गई। संन्यासी बनने से पहले सभी ने अपना और अपने पितरों का पिडदान कर नया जन्म पाया।

इस प्रक्रिया के बाद सबने फिर गंगा में डुबकी लगाई। उन्हें नए वस्त्र दिए गए। देर शाम को सभी अगले संस्कार के लिए अखाड़े लौटीं। देर रात्रि अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने सबको प्रेष मंत्र दिया। महंत हरि गिरि ने बताया कि रात्रि में गंगा में 108 बार डुबकी लगाने के बाद महिला साधु संन्यासी बन गईं।

बताया कि संन्यासी बनने से पहले वह साधु बनती हैं। इन्हें पंच दीक्षा दी जाती है। पांच महिला गुरु होती हैं। इसमें एक गुरु रुद्राक्ष, दूसरा कपड़ा, तीसरा विभूति, चौथा चोटी काटेगा और पांचवां लंगोटी देता है। इस प्रक्रिया के तीन वर्ष के बाद ही इन सबको संन्यासी बनाया जाता है। चौबीस घंटे तक इन्हें कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है।

दलित महिलाओं ने भी लिया संन्यास

जूना अखाड़े के संरक्षक महंत हरि गिरि ने बताया कि सभी जाति की महिलाओं ने बुधवार को संन्यास लिया है। इसमें दलित, वाल्मीकि एवं रैदासी भी हैं। बताया कि जूना अखाड़े के दरवाजे सभी जातियों के लिए खुले हैं, यहां सभी को समाहित किया जाता है।

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