योगेन्द्र शर्मा। परमात्मा की भक्ति के शास्त्रों में अनेक विधान बताए गए हैं। गृहस्थ जहां सामान्य तरीके से पूजा अनुष्ठान करते हैं तो संतों की पूजा विधान का तरीका आम लोगों से हटकर होता है। संन्यासी कई तरह से पूजा, आराधना, तप, तपस्या और जप करते हैं। इसके तहत शरीर को कष्ट देकर प्रभू को प्रसन्न करने के उपाय किए जाते हैं। साधुओं की तपस्या का एक ऐसा ही संस्कार है धुनी रमाना। आग बरसते सूर्य की तपीश में वैष्णव संतों के द्वारा धुनी रमाने की प्रक्रिया संपन्न की जाती है।

महर्षि वशिष्ट ने महर्षि विश्वामित्र को दिया था धुनी रमाने का ज्ञान

सूर्य जब चरम पर होता है उस वक्त सूर्य की ओर मुख करके धुनी रमाई जाती है। इसका एकमात्र उद्देश होता है प्रभूमिलन की आस। धुनी रमाना शास्त्रोक्त और इसका पौराणिक और वैदिक महत्व है। ऋग्वेद के अनुसार धुनी रमाना तपस्या के चरमोत्कर्ष का एक रूप है। और महर्षि वशिष्ट ने महर्षि विश्वामित्र को यह तप बताया था। उपनिषद में अगस्त्य ऋषि ने अपने शिष्य सुतिक्षण को इस तप क्रिया का ज्ञान दिया था। तैतरीय उपनिषद में भी इसका उल्लेख मिलता है।

धुनी रमाते समय इंद्रियों के वशीकरण की कोशिश की जाती है और साधक ब्रह्म साक्षात्कार की अनुभूति करते हैं। धुनी एक अग्नी तपस्या है, जिसमें साधक आत्म संशोधन करता है। इसको योग का भी एक प्रकार माना जाता है। अग्नि तत्व के द्वारा शरीर की शुद्धी करते हुए आत्मा की उन्नति के लिये तप किया जाता है। इस तपस्या को तीन घंटे के समय में विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से किया जाता है।

संकल्प क्रिया - इसके अंतर्गत तप करने का संकल्प लिया जाता है।

आव्हान क्रिया - इसके अंतर्गत इष्टदेव का आव्हान किया जाता है।

प्राणायाम क्रिया - इसके अंतर्गत प्राणायाम में कपालभाती प्राणायाम किया जाता है। रेचक, कुंभक और पूरक क्रियाओं द्वारा प्राणवायु को कपाल में स्थिर किया जाता है।

धुनी में होता है दुर्लभ जड़ी-बूटियों का समावेश

इस साधना के दौरान अगली क्रिया है योगासन, मंत्रजाप, मंत्राहूति और इसके बाद तर्पण किया जाता है तपस्या की पूर्णाहूति में इस क्रिया का विसर्जन होता है। धुनी रमाते समय जलाने वाले कंडों में तिल, जौ, शर्करा, घृत, गुगल, चावल, चंदन, जटामासी, सुगंधबाला, सुगंधकोकिला, कमलगट्टा, देवदार की लकड़ी एवं इंद्र जौ को डाला जाता है। इन सबसे उत्पन्न होने वाला धुंआ जब श्वास के दौरान शरीर में प्रवेश करता है तो दिमाग की शुद्धी मानी जाती है। धुनी की सामग्री में कुछ सन्यासी हिमालय की दुर्लभ जड़ी-बूटी का भी समावेश करते हैं।

18 साल और 6 चरणों में होती है धुनी की प्रक्रिया पूर्ण

धुनी रमाने के लिये 18 साल में छह चरणों से गुजरना पड़ता है। उसके बाद धुनी रमाने की ये कठोरतम तपस्या पूर्ण मानी जाती है।

1. धुनी रमाने का सबसे पहला यानी प्रारंभिक चरण ‘पंचधुनी’ होता है। इस धुनी में कंडे या उपले का घेरा पांच कंडों का होता है।

2. द्वितीय चरण ‘सप्तधुनी’ का होता है। जिसमें सात जगह धुनी लगाई जाती है।

3. तृतीय चरण ‘द्वादशधुनी’ का होता है। जिसमें बारह जगह धुनी रमाई जाती है।

4. चतुर्थ चरण ‘चौरासीधुनी’ का होता है। जिसमें 84 जगह धुनी लगाई जाती है। इस काम में दूसरे साधुओं की भी मदद लेना पड़ती है।

5. पंचम चरण ‘कोटधुनी’ का होता है। जिसमें जलते कंडों के बीच दूरी नहीं रखी जाती है पूरे घेरे में धुनी जलती है।

6. षष्टम और अंतिम चरण ‘कोटखोपड़धुनी’ का होता है। यह तपस्या का सबसे कठिन चरण होता है। जिसमें सिर पर मिट्टी के पात्र में अग्नी रखकर तपस्या की जाती है।

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