अंकित कुमार, कुंभनगर। यह संगम है, पुण्य की लालसा और आस्था की पराकाष्ठा का अद्भुत मिलन का स्थल। मौनी पर मनौती के लिए झोली फैलाए जिस ढंग से श्रद्धालु दौड़े चले आ रहे थे, उनकी जीवटता किसी को भी कायल करने वाली थी। पावन पल में देवताओं के बरसाए अमृत के लाभ की इच्छा इस कदर हर मन में हिलोर मार रही थी कि माघ की हाड़ कंपाने वाली ठंड भी उन्हें विचलित नहीं कर पाई।

गोमुख से निकलने वाली अविरल गंगा की तरह लाखों-करोड़ों का रेला जैसे सबकुछ बहा ले जाने को आतुर हो। त्रिवेणी में डुबकी की धूनी रमाए वे बढ़े चले जा रहे थे। उन्हें रोक पाया तो संगम तीरे सदियों से तनकर खड़ा श्रद्धा और सनातनी परंपरा का बांध। एक के पीछे एक जत्था आता जा रहा था और गंगा-जमुना के परोपकार की फैली विशालकाय ओढ़नी को ओढ़कर उनके तट किनारे ही पसर जाता। वो भी खुले आसमान और बर्फ की तासीर बन चुकी रेती में...।

रविवार भोर से ही देश-दुनिया के श्रद्धालुओं का रुख तीर्थराज की ओर मुड़ गया था। शाम होते-होते संख्या, हजारों, लाख और करोड़ को छूने लगी। सड़कों पर सिर्फ जनसमुद्र ही जनसमुद्र। मंजिल सभी की एक संगम और सिर्फ संगम। स्नान के मुहुर्त में इंतजार था लेकिन, अवसर की होड़ की हिलोरे हर तरफ मार रही थी। भीड़ की थाह लेते-लेते शाम से कब निशा गहरा गई पता ही नहीं चला।

रात के दस बज गए। जनसमुद्र थमने के बजाए सुनामी की शक्ल में सामने था। शहर की हर सड़क पर सिर्फ सिर ही सिर। संगम का दृश्य ऐसा, उसे समाने के लिए आंखों की पहुंच जवाब दे गई। कोलाहल अपार था लेकिन, शंखनाद, जयकारे, भजन और लाउडस्पीकर पर गूंजती सुरक्षा की उद्धघोषणा के मिश्रण से वह भी कानों में रस घोल रहा था। जैसे-जैसे लोग आते जा रहे, जहां ठौर मिलता ठिया जमा लिया।

एक तो माघ, उस पर भी मौनी अमावस्या की आमद। लगभग विदाई जैसा अहसास कराने वाली ठंड भी देवताओं के बरसने वाली अमृत की चाह में ठिठककर मुश्किलें खड़ी कर रही थी मगर..., उसका सामना संगम में अगाध आस्था रखने वालों श्रद्धालुओं से था। डिगने को कोई तैयार नहीं। जहां जगह मिली, खुले आसमां में ठंडी रेती पर बिछौनी बनाकर लेट-बैठ गए। तमाम ऐसे थे, गृहस्थी बांधकर लाए थे। चूल्हा चढ़ाया और बातों के साथ खाने की खिचड़ी भी पकने लगी।

महेश शर्मा गाजियाबाद से आए थे। आईटी सेक्टर में काम करते हैं। हुलिया पूरी तरह दिल्ली एनसीआर की संस्कृति में रचा-बसा मगर, आज सबकुछ त्यागकर भीड़ के बीच मुहुर्त के इंतजार में टकटकी लगाए बैठे थे। मोबाइल पर उलझे रहने वाले परिवार के अन्य सदस्य भी बस आध्यात्म की जिज्ञासा को शांत करने में लगे थे। इंतजार की राह कुछ आगे बढ़ी और रात के ग्यारह बज गए। लाउडस्पीकर गरजा कि मुहुर्त करीब है, 11.19 से स्नान आरंभ होगा।

यह सुनते ही उंघते और सुस्ताते लोग चौकस फौजी की तरह तनकर खड़े हो गए। झोला-झंडा समेटा और घाटों की ओर चल पड़े। इसी के साथ पुण्य की डुबकी का सिलसिला आरंभ हो गया। मौनी की मान्यता के अनुरूप मौन साधे...। धीरे-धीर रात सोमवार की ओर बढ़ने लगी और पुण्य की डुबकी जोर पकड़ती गई, फौ फटते-फटते आस्था के ज्वार का जोर आसमान की ऊंचाइयां छूने लगा।

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