विजय सक्सेना, कुंभ नगर। बुंदेलखंड एक्सप्रेस से जंक्शन पर उतरकर बाहर आते ही रत्नेश प्रकाश को तीर्थ पुरोहित अरुण कुमार ने रोक लिया। उन्होंने अपना परिचय देते हुए रत्नेश को उनके पिता और बाबा का नाम बताया। इससे संतुष्ट रत्नेश ने अरुण के साथ संगम की राह पकड़ ली, जो कि शुक्रवार को पूजा-पाठ करने पहुंचे थे।

उन्होंने अपने तीर्थ पुरोहित को आगमन की सूचना पहले ही दे दी थी। दरअसल, तीर्थ पुरोहितों की अपने यजमानों के प्रति यह परंपरा सनातन काल से चली आ रही है। सूचना प्रौद्योगिकी ने भले ही प्रत्येक क्षेत्र में जगह बना ली हो। लेकिन कुछ पुरातन प्रथाएं आज भी जड़ें जमाए हैं। प्रयागराज के तीर्थ पुरोहित उन्हीं में से एक हैं। संगम तट पर तीर्थ पुरोहित विभिन्न झंडों और चिह्न के तले यजमानी करते हैं, जिनके पास देशभर से यजमान आते हैं।

लालटून का लाल झंडा के तहत यजमानी करने वाले तीर्थ पुरोहित अरुण कुमार और किरन कुमार के पास उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा, झांसी, हमीरपुर समेत मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों से यजमान आते हैं।

अरुण बताते हैं कि उनके पास परदादा पंडित अनंतराम के समय से यजमानों की पोथी मौजूद है। इसमें करीब डेढ़ सौ वर्ष का ब्योरा है। उनकी पोथी में 114 वर्ष पहले बांदा में सुरहनदेव दाऊ तिवारी का रिकार्ड दर्ज है। परदादा अनंतराम के बाद बाबा पंडित बेनी माधव ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके बाद पिता शिव प्रसाद ने यह विरासत संभाली और अब अरुण सात भाइयों के साथ उसे आगे बढ़ा रहे हैं।

बताया कि पूजा-पाठ, कर्मकांड आदि के लिए आने वाले यजमानों का नाम सबसे पहले चौबंदा में दर्ज किया जाता है। यह एक तरह का रजिस्टर होता है। उसके बाद इसे पोथी में दर्ज करते हैं। सफेद झंडे पर हरी मछली निशान वाले तीर्थ पुरोहित राजेंद्र पालीवाल के पास प्रयागराज, चित्रकूट, बांदा समेत मध्य प्रदेश के यात्री आते हैं। उनके पास यजमानों का कई सौ वर्षों का ब्योरा है। करीब 200 वर्ष का रिकार्ड बही-खातों में मौजूद है। इससे पुराना विवरण भोज पत्र और ताम्र पत्र में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं।

निहाई हथौड़ा लोहे का पिंजरा निशान वाले अनुज तिवारी के पास बिहार के पटना, बेगूसराय, झारखंड के रांची समेत नेपाल से भी यात्री आते हैं। अनुज बताते हैं कि यजमान अपने परिवार के सदस्यों का नाम पोथी में देखकर खुश होते हैं। मुनीम दर्ज करते हैं पोथी में ब्योरा संगम किनारे चौकी लगाकर पूजा-पाठ कराने वाले तीर्थ पुरोहित पोथी में ब्योरा दर्ज करने के लिए वेतन पर मुनीम भी रखे हुए हैं।

किरन बताते हैं कि यात्री का नाम चौबंद में लिखने के बाद इसे मुनीम के हवाले कर दिया जाता है,जिसे मुनीम नाम, पते के साथ पोथी में दर्ज करते हैं। दान-दक्षिणा लेने जाते हैं यजमानों के घर संगम किनारे यजमानी करने वाले तीर्थ पुरोहित वर्ष में दो माह यजमानों के घर भी जाते हैं।

यहां आने वाले यजमान पूजा-पाठ और कर्मकांड के दौरान दान-दक्षिणा बोल कर चले जाते हैं। इसके बाद तीर्थ पुरोहित मई-जून में उनके घर जाते हैं और दान-दक्षिणा प्राप्त करते हैं। इस दौरान यजमान उनका स्वागत-सत्कार करते हैं। दक्षिणा लेने जाने की परंपरा भी सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।

कंप्यूटर, लैपटॉप से परहेज

पोथी में यजमानों का सैकड़ों वर्ष का विवरण दर्ज करने वाले तीर्थ पुरोहितों को कंप्यूटर, लैपटॉप से परहेज है। पालीवाल का कहना है कि कंप्यूटर में ब्योरा दर्ज करने पर डाटा चोरी हो सकता है। पोथी को बक्सों में सहेज कर रखा जाता है। कहा कि हम कंप्यूटर अपनाकर आस्था को ठेस नहीं पहुंचा सकते।

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