सद्गुरु शरण, कुंभनगर। हदें तोड़ता आस्था का समंदर और उसे अपनी बांहों में भरने को बेकरार संगम। सोमवार को मौनी अमावस्या के शाही स्नान पर जिन करोड़ों आंखों ने यह कुंभ देखा, वे इसे ताउम्र भूल नहीं पाएंगी। मौनी अमावस्या पर सनातन धर्म गरज रहा था। अखाड़ों के संतों के साथ संगम में डुबकी लगाकर श्रद्धालु धन्य हुए और धन्य हुआ पवित्र संगम, जिसने इससे पहले ऐसा कुंभ नहीं देखा।

प्रशासन का दावा सच के करीब लगता है कि शाम छह बजे तक पांच करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम पर डुबकी लगाई। यह कुंभ के इतिहास का सबसे बड़ा शाही स्नान है। यह सोमवती अमावस्या की भी सुबह है। त्रिवेणी के दोनों किनारे रोशनी से जगमग हैं। अभी भोर है। संगम आज झपकी भी नहीं ले पाया क्योंकि मौनी अमावस्या पर पुण्य डुबकी के आकांक्षी लाखों लोग 24 घंटे पहले ही उसके तट पर आ डटे हैं।

कोई वहां से डिगने को तैयार नहीं। संगम के आसमां पर चंद्रमा ओझल है, लेकिन तारे डेरा जमाए हुए हैं। ऐसे नजारे रोज नहीं मिलते, पर सूरज अपना अधिकार छोड़ने को राजी नहीं। अंततः तारों ने जिद छोड़ी और संगम के क्षितिज पर मोहक लालिमा और गुनगुनी किरणों के साथ सूर्यदेव के उभरते ही संगम स्वर्णिम हो उठा।

प्रशासन की अग्निपरीक्षा शुरू हो चुकी थी। सजे-धजे अखाड़े अपने अनुयायियों और श्रद्धालुओं के साथ क्रमशः स्नान कर रहे थे। छटा अलौकिक हो गई। बाल सुलभ क्रीड़ा करते नागाओं के स्नान का दृश्य सबकी आंखों में बस जाना चाहता था। प्रशासनिक अधिकारी और सुरक्षाकर्मी प्रयास कर रहे थे कि स्नान कर चुके श्रद्धालु वापस जाएं, पर अखाड़ों का स्नान देखे बगैर कोई जाने को तैयार नहीं। नौ बजे जूना अखाड़ा की बारीआई, जिसके साथ नया-नवेला किन्नार अखाड़ा भी स्नान करने आ रहा था।

श्रद्धालुओं का धैर्य टूट रहा था। आंखें यह दृश्य करीब से देखना चाहती थी, पर प्रशासन के अपने एहतियात थे। श्रद्धा और सुरक्षा के बीच मीठी-मीठी खींचतान जारी थी। जूना अखाड़े का भव्य-दिव्य जुलूस आ पहुंचा था। श्रद्धालु स्थिर हो गए थे। वे यह पावन दृश्य अपनी चेतना में घोल लेना चाहते थे। संतों के साथ संगम मस्त हो गया। सनातन धर्म की लाल-भगवा पताकाएं श्रद्धा-समुद्र की लहरों की तरह ऊर्ध्वमुख थी।

हर-हर महादेव और त्रिवेणी के जयकारों के साथ कुंभ अपने चरम पर है। स्नान कर संत अखाड़ों की ओर लौट रहे थे, पर लाखों श्रद्धालु अभी भी डटे थे। संगम इस श्रद्धा पर बलिहारी है। उसके तट पर मासूम बच्चों से लेकर बुजुर्ग श्रद्धालुओं तक का मेला है। अधिकतर लोग पिछले 24 घंटों में कई बार उसके अमृत में डुबकी लगा चुके हैं, पर दिल नहीं भर रहा। श्रद्धा का ज्वार देखकर ठंड झेंप रही।

दोपहर के बाद शाम आ गई। अखाड़ों के शाही स्नान शांति से निपटाकर प्रशासन थोड़ा निश्चिंत जरूर है, पर श्रद्धा का समंदर अभी भी हिलोरे ले रहा है। आज कुंभ पूरे प्रयागराज में फैला है। जितने लोग कुंभनगर से विदा हो रहे, उससे अधिक अब भी दाखिल हो रहे। अब सूरज वही मोह पाल रहा जो सुबह तारों के मन में था, पर अब चंद्रमा की बारी है। अमावस के दूसरे दिन वह पूरी तरह नहीं तो हल्का सा झांककर ही देवनगरी के वैभव से विभोर होगा। पश्चिमी क्षितिज रक्तिम होने लगा। संगम के भाग्य से ईर्ष्या पालकर सूरज विदा हो रहा। संगम फिर स्वर्णिम होने लगा है, पर उसे शायद आज भी रतजगा करना है। श्रद्धालु अब भी आ रहे और स्नान जारी है। सनातन धर्म की ध्वजा और ऊंची हो गई है।

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