ब्रह्माकुमार राम लखन

विश्व परिवार की भावना और विश्व कल्याण की कामना ही सच्ची-सच्ची राष्ट्रीयता है। जिस तरह कई घरों को मिलाने से गांव, अनेक गांव व शहरों को मिलाने से शहर बनता वैसे ही कई देशों के समूह को विश्व कहा जाता है। सभी घर तो अलग-अलग है पर मिलने से गांव व शहर कहे जाते हैं वैसे ही देश व राष्ट्र अलग-अलग होते हुए भी सभी के मिलने से धरती शोभायमान लगती है।

सभी इंद्रियों के मेल से हमारा शरीर शोभायमान होता तो अनेक छोटे-बड़े देशों रूपी इंद्रियों से वसुन्धरा सुशोभित है। किसी भी अंग-अवयव में पीड़ा होने पर पूरा शरीर बेचैन रहता है तो देश व राज्यों के पीड़ित होने पर पृथ्वी भी संकटग्रस्त हो जाती है। संचार क्रांति के कारण हर देश की पीड़ा घण्टों-मिनटों में पूरे देश में फैल जाती है।

इंद्रियों के नियोगी होने पर पूरा शरीर बलिष्ठ बना रहता है वैसे ही सभी देशों की समृद्धि से धरा स्वर्ग कहलाती है।

सत्य की समझ खत्म हो जाने से ही देश प्रेम के नाम पर मानव बम तक बनाकर लोग एक-दूसरे को तहस-नहस करने में जुटे हुए हैं। हमें अब से ऐसा कार्य-व्यवहार करना चाहिए जिससे सब का भविष्य स्वर्णिम बन सके फलस्वरूप संसार ही कल्याणमय क्रीडांगन बन जाएगा।

पृथ्वी पर विचरण करने वाले हर नर-नारी को विश्व परिवार की भावना से देखना चाहिए। हरेक देशवासी दूसरे देशवासियों को पड़ोसी के साथ-साथ सेवा-सहकर्मी समझ कर व्यवहार करें। सम्पूर्ण मानवता को पारिवारिक भावना से अपनाने से ही धरती पर स्वर्ग की कल्पना साकार होगी। तब ही सभी प्राणी सुख-शांति-आनंद का अनुभव कर सकेंगे। सत्याचरण से ही संसार में सौहार्द्र कायम होगा। सत्य व्यवहार से ही पारस्परिक प्रेम और विश्वास बढ़ता है।

असत्य से अविश्वास और घृणा को बढ़ावा मिलता है। इसने ही मानवता में विभाजन रेखाएं खींची हैं। अब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय नीतियों में भी सत्य पर आधारित व्यवहार व्यापार होना चाहिए। कूटनीतिक प्रचलन से दुनिया का पतन और विभाजन बढ़ता ही जा रहा है।

असत्य ने विश्व के टुकड़े-टुकड़े करके संसार को संकटग्रस्त कर दिया है। सभी रिश्तों-नातों से अठखेलियां करता हुआ झूठ दु:ख-दर्द-अशांति बढ़ाता जा रहा है। सत्यं-शिवं-सुन्दरमं से ही संसार के सभी लोग स्वच्छ व सुंदर बन देवी-देवता कहे जा सकेंगे। असत्य, अंतकरण को मलिन और चंचल बनाता जबकि सत्य से जीवन निर्मल-निष्पाप और स्थिर होता रहता है।

संसार के सभी धर्म संप्रदायों के संस्थापकों ने सत्य पर बल दिया है। फिर भी दुनिया बेईमानी के गर्त में क्यों गिरती जा रही है? टीचर और प्रीचर ही संसार में सत्य स्थापित कर सकते हैं। कलयुग की अंतिम घड़ियों में जब खुद खुदा ही परमशिक्षक परम सतगुरु बनकर अवतरित हो ब्रह्मा मुखकमल से सच्चा गीता ज्ञान सुना रहे हैं तो सबमें सच्चाई के स्वाभाविक संस्कार जागृत होंगे ही। अब से सच्चाई का सम्पूर्ण रीति से अडिग आधार बनाना चाहिए।

राजनेता, धर्मनेता व अभिनेता जब सच्चाई का प्रदर्शन करने लगेंगे तो व्यापार-व्यवसाय भी सत्यतापरक हो जायेंगे। यदि जीवन में सत्याचरण नहीं अपनायेंगे तो परम सत्य परमात्मा से विमुख हो जाएंगे। माता-पिता सत्याचारी होंगे तो संतति स्वत: उनका अनुसरण करती रहेगी। घर-गृहस्थी में सत्य की प्रतिष्ठा हो जाए तो सारा संसार ही कल्याणमय क्रीडांगन हो जायेगा। परमात्मा की सत्य बृद्धि सतयुग में असत्य का नामोनिशान नहीं होगा।

सारा संसार ही वसुधैव कुटुम्बकम की भावनाओं से ओतप्रोत रहेगा। बेरोक-टोक के सभी लोग कहीं भी जा सकेंगे। असत्य के बढ़ते जाने से स्थितियां बिगड़ती जा रही हैं। दूसरे देशों के सभी नागरिकों को संदेह के दायरे से देखा जाता है। सत्य के बल से ही धरा के सर्वसम्प्रदाय सभी के लिए निर्बाध प्राप्त थी। सही को सदाचरण कहा जाता तो जो कुछ भी गलत हो रहा दुराचरण ही कहलायेगा। सदाचार ही विश्व सुधार की कुंजी है। इससे विश्व हितकारी भावनाएं पनपेंगी। सतयुगी झाड़ दिखाई देने लगेंगे।

कोई भी धर्म या समाज व्यसन और बुराइयों को तथा विलासिता को अच्छा नहीं मानता है। आज के समुन्नात कहलाने वाले राष्ट्र मलिन आचार-विचार-संस्कार को खुली छूट दे रखे हैं। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अर्थ बुराइयों के लिए कदापि छूट नहीं होनी चाहिए।

सांप्रदायिकता ने तो संसार में दुराचरण की आंधियां उड़ा रखी है। विश्वव्यापी सदाचरण के रास्ते में सांप्रदायिक भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा है। अब मानव की चरित्रहीनताए दूर कर उच्च सदाचरण की स्थापना करना आवश्यक हो गया है। ज्ञान सागर शिव ही सर्वोच्च बोध कराकर मानवता को सत्याचार से समलंकृत कर सकते हैं।

जब साधनों के साथ-ही-साथ साधना से भी समलंकृत होकर विश्व कल्याण के महान कार्य में जुट जाना चाहिए। सारे संसार में सत्य और सदाचरण की स्थापना का कार्य सरल नहीं है। सृष्टि को अलौकिक परिवार बनाना महानतम कार्य है। बौद्ध भिक्षुओं ने पूरे एशिया में बौद्ध धर्म फैला दिया सारे संसार में मुस्लिम और क्रिश्चिन धर्म फैल गया तो ईश्वरीय मत से विश्व परिवार क्यों नहीं बन पायेगा ?

ऐसे महान कार्य में ब्रह्मावत्स जितने तपोपूत होंगे इतनी ही तत्परता से विश्व नव निर्माण के कार्य में सहयोगी बन सकेंगे। यह धरा अनंत ऐश्वर्य की खान है परंतु तपस्या के बल से ही उसका सुचारू दोहन हो सकता है। आरामतलबी ही विलास-व्यसन की जननी है जो जीवन की क्षत-विक्षत कर देती है। तपस्या की पवित्रता से भौतिक विभूतियां प्राप्त होती हैं। जिससे हम देवत्व की ओर बढ़ सकेंगे। सद्विवेक से ही यह पृथ्वी सौभाग्य-समृद्धि और सम्पन्नाता का द्वार खोलती है तब विश्व ही क्रीडांगन की तरह लगता है।

Posted By: Lav Gadkari

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