जे. कृष्णमूर्ति

अभिमान-स्वाभिमान, मैं, अहं, आत्म, स्व आदि शब्द पर्यायवाची हैं। जब कभी भी जिस भी उम्र में हम अपने बारे में सोचने-समझने लगते हैं, तो उम्र के साथ ही हम चाहे-अनचाहे अपना व्यक्तित्व भी बनाने लगते हैं। विभिन्ना तत्वों को जोड़-घटा कर, उनका सामंजस्य कर, हम अपने को गढ़ने लगते हैं। व्यक्ति अपनी रुचि-अरुचि के अनुसार, विभिन्ना तरह के लक्षण अपना लेता है।

हम अपना एक ऐसा मुखौटा गढ़ते हैं, जैसा कि हम समाज को दिखना चाहते हैं। इसी तरह, हम खुद-स्वयं के लिए और विभिन्ना संबंधों के लिए भी अलग-अलग या विभिन्ना चीजों को जोड़कर मुखौटे बनाते हैं। समाज हमें और हम समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इन्हीं मुखौटों की सच्ची-झूठी हकीकतों से पहचानते हैं। समाज में इसे किसी व्यक्ति के लक्षणों के रूप में जाना जाता है और तद्नुसार भला-बुरा, नगण्य, घमंडी-गंदा, बुद्धिजीवी, स्वार्थी आदि की सामान्य प्रतिक्रियाएं देता है। विशिष्ट लक्षणों को विशिष्ट मान्यताएं देता है। किसी भी मुखौटे को गढ़ना यानी अहं को गढ़ना है। अपने मूल अस्तित्व से भिन्ना एक कृत्रिम चीज गढ़ना है।

आत्म विकास का अर्थ अहं का विकास ही है। हम अपने बारे में जो भी भला-बुरा सोचकर, योजना बनाकर, जानबूझकर आदर्शों के लक्ष्य स्थापित कर प्रगति की सीढियां बनाते हैं, इनसे हम दु:ख के मार्ग पर ही चलते हैं। क्योंकि तय करके चलेंगे तो राह में कई बाधाएं आएंगी।

इतना सोच-समझकर चलने पर भी दु:ख खत्म नहीं होता, तो हम अपनी विवेक-विचार क्षमता को ही निकम्मा जानकर सोचने-समझने को एक तरफ रख देते हैं और किसी विश्वास को पकड़ लेते हैं। किसी किताब, गुरु या किसी पुरानी से पुरानी सिद्ध चीज के पीछे लग जाते हैं और उसमें लिखे की नकल करने लग जातें हैं। उनकी बातों का अंधानुकरण करने लग जाते हैं। यह सब भी हम अपने व्यक्तित्व तथा अहं को पुष्ट करने के एक तरीके की ही तरह करते हैं। इसमें भी कोई लक्ष्य या आदर्श और फिर उस पर आगे बढ़ने की रास्ते और सीढियां होती हैं, इन पर भी दु:ख रहता ही है।

इसका मतलब है कि हमारे मौलिक वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त भी, एक इच्छा या चाह है और हम उसे पूरा करना चाह रहे हैं... वह पूरी नहीं होती और दु:ख होता है। हम अपनी वास्तविकता से इतर विचारों से एक कृत्रिम व्यक्तित्व, आदर्श या लक्ष्य गढ़ते हैं, जो कि अहं ही होता है। इस लक्ष्य की राह पर चलने से ही दु:ख होता है। अपने मूल स्वरूप, वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त खुद को किसी भी अन्य कृत्रिम रूप में जानने, पहचानने, उसके बारे में विचार करने में ही दु:ख का बीज छिपा है। जब हमारे विचार, अपने बारे में कोई कृत्रिम छवि गढ़ते हैं, तो हम दु:ख का बीज बोते हैं। जब हम अपनी छवि को पालते-पोसते हैं, तो दु:ख को पालते-पोसते हैं।

इसी कुछ होने-बनने की चाह और तद्नुसार कोशिश करने और इसमें होने वाले दु:ख के कुचक्र से निकलने के लिए, हम क्या कर सकते हैं?

हम जैसे कुदरती हैं, मौलिक रूप से हैं...वैसे ही रहें। किसी चीज को कल्पना, विचार, सिद्धांत या शाब्दिक रूप से समझने की बजाय, उसका साक्षात अवलोकन करें तो ही उसका यथार्थ समझ आ सकता है। यदि कोई दु:ख से मुक्त होना चाहता है, तो उसे अहं को बनाने वाली संपूर्ण प्रक्रिया से वाकिफ होना होगा। इस अहं निर्माण की प्रक्रिया पर रोक लगानी होगी। अपने अस्तित्व की वास्तविकता में रहना होगा।

Posted By: Sandeep Chourey

  • Font Size
  • Close