चैतन्य कीर्ति

कई वर्षों से चिंतक और दार्शनिक, नैतिकतावादी और अध्यात्मक के राही, राजनीतिज्ञ और तानाशाह और यहां तक कि आम आदमी भी इस संसार को अपनी सोच के मुताबिक बदलना चाहते रहे हैं। आप पूछेंगे कि आखिर किस तरह का बदलाव- तो वैसा बदलाव जो उनकी सोच के अनुरूप हो। कई क्रांतियां हुईं और उनमें से कुछ में तो बहुत खून भी बहा।

कई बार किसी क्रांति के मूल में कथित धार्मिक मान्यता भी रही है या ऐसा कोई विचार जो ज्यादा लोगों को प्रभावित कर सके। आज भी यह हो रहा है लेकिन आप पाएंगे कि कोई खास बदलाव नहीं आ रहा है। हम गौर करें तो पाएंगे कि बदलाव तो किसी वृत्त की परिधि पर ही है। मनुष्य का मनोवृत्ति मूल रूप से नहीं बदली है। उसके सोचने का ढंग नहीं बदला है।

ओशो इसे बायजिद की कहानी के जरिए समझाते हैं। बायजिद ने अपनी आत्मकथा में खुद लिखा है, 'जब मैं युवा था तो अपनी सभी प्रार्थनाओं में ईश्वर से यही कहता था कि हे ईश्वर, मुझे शक्ति दो ताकि मैं इस दुनिया को बदल सकूं। तब हर व्यक्ति मुझे गलत ही नजर आता था। मैं तब क्रांति के विचार से भरा था और धरती को बदलने की इच्छा रखता था।

जब मेरी उम्र थोड़ी अधिक हुई तो मैं अपनी प्रार्थनाओं में ईश्वर से कहने लगा कि यह दुनिया को बदलने का लक्ष्य तो बड़ा है। उम्र मेरे हाथों से फिसल रही है और मेरी आधी उम्र तो बीत भी चुकी है और मैं किसी भी व्यक्ति को नहीं बदल सका हूं तब यह संसार तो बहुत ही बड़ा है। तब मैंने ईश्वर से कहा कि हे, ईश्वर मैं अपने परिवार को ही बदल सकूं तो बहुत है तो मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं परिवार को बदल सकूं।'

बायजिद आगे लिखता है, 'जब मैं बूढ़ा हो गया तो मैंने पाया कि परिवार को बदलने की इच्छा भी बहुत बड़ी इच्छा थी और फिर उन्हें बदलने वाला मैं कौन होता हूं? तब मैंने तय किया कि अगर मैं खुद को ही बदल लूं तो वही बहुत होगा और वही सबसे अच्छा भी होगा। तब मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि हे ईश्वर, अब मैं सही जगह आ गया हूं। अब मुझे सिर्फ खुद को बदलने की शक्ति दो। तब ईश्वर ने उत्तर दिया, अब समय ज्यादा बचा नहीं है। अगर तुम युवावस्था में ही खुद को बदलने की शक्ति मांगते तो शायद इस बात की संभावना थी कि तुम खुद को बदल सकते थे।'

मैं सोचता हूं कि यह बायजिद की ही कहानी नहीं है बल्कि हर व्यक्ति की कहानी है। यह दुनिया के हर व्यक्ति की कहानी है। हम अपनी पूरी ताकत के साथ दूसरों को बदलना चाहते हैं लेकिन उसी शक्ति के साथ हम खुद को बदलना नहीं चाहते हैं।

इसलिए हमारी कोशिशों के बावजूद कुछ नहीं बदलता है। आध्यात्मिक गुरु हमें सुझाते हैं कि हमें इस बारे में सोचना चाहिए। ओशो कहते हैं, 'ध्यान हमें बदलता है। यह हमें चेतना के ऊंचे आयाम पर ले जाता है और यह आपकी पूरी जीवनशैली को बदल देता है। यह आपकी रिएक्शन (प्रतिक्रिया) को रिस्पॉन्स (प्रतिसाद) में इस तरह बदल देता है कि आप अचंभित रह जाते हैं। ध्यान से पहले जो व्यक्ति किसी परिस्थिति में क्रोध करता था अब वह उस परिस्थिति में अधिक करुणा के साथ बात करता नजर आता है। उसके बर्ताव में प्रेम का पुट अधिक हो जाता है।'

आशो कहते हैं, 'जब आप ध्यान करते हैं तो यह दुनिया नहीं बदलती है बल्कि यह पहले जैसी ही रहती है लेकिन ध्यान के जरिए आप बदल जाते हैं। और जब आप बदल जाते हैं तो दुनिया भी बदल जाती है क्योंकि वह आपकी दुनिया है। उसे जिस तरह से आप देखेंगे वह वैसी ही नजर आएगी।'

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