संसार के लगभग हर धर्म में माला जपने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है। यह मालाएं कई तरह की होतीं हैं कोई माला मोतियों माणिक की बनी होती है तो कोई तुलसी के काष्ठ(लकड़ी) की।

मान्यता है कि इनमें पत्थर से बनी माला काफी शुभ मानी जाती है। प्रत्येक साधना में अलग-अलग मालाओं का उल्लेख रहता है। इसका कारण यही है, मालाएं तो सभी एक सी ही हैं। पर जिस साधना विशेष के लिए जिस माला को बतलाया जाता है। उस साधना के लिए वही माला प्रयुक्त करनी चाहिए।

जैसे श्री लक्ष्मी साधना के लिए सिद्ध की गई माला से लक्ष्मी साधना संपन्न नहीं हो सकेगी अगर प्रयास किया भी जाए तो असफलता ही मिलेगी जो मुख्य बात होती है वह माला में नहीं बल्कि इस बात में होती है कि वह किन मंत्रो से और किस पद्धति से प्राण प्रतिष्ठित की गई है।

महत्व मंत्र उर्जा एवं प्राणश्चेतना का ही होता है शेष माला का पदार्थ एक आधार का काम करता है। वैसे बाजार में सभी प्रकार की मालाएं मिलती हैं बिना मंत्र सिद्ध की हुई माला चेतना के नाम पर वे निष्प्राण होती हैं और इसी कारण साधना के लिए यह विफल हो जाती हैं।

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