द्वापर युग में महाकाल की नगरी उज्जैन में श्रीकृष्ण विद्यार्थी बन आए थे। उस समय उज्जैन का नाम अवंतिका था। श्रीकृष्ण अकेले नहीं उनके साथ उनके बड़े भाई बलराम आए थे। उन्होंने संदीपन ऋषि के सानिध्य में विद्या अर्जित की।

श्रीकृष्ण कंस का वध करने के बाद मथुरा का समस्त राज्य अपने नाना उग्रसेन को सौंप दिया था। इसके उपरांत वसुदेव और देवकी ने कृष्ण को यज्ञोपवीत संस्कार के लिए संदीपन ऋषि के आश्रम में भेज दिया। महाभारत, श्रीमद्भागवत, ब्रम्ह्पुराण, अग्निपुराण तथा ब्रम्हवैवर्तपुराण में सांदीपनि आश्रम का उल्लेख मिलता है।

संदीपन ऋषि के आश्रम में ही कृष्ण और सुदामा की भेंट हुई थी, जो बाद में अटूट मित्रता बन गई।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण लगभग 5500 वर्ष पूर्व द्वापर युग में अवंतिका आए थे। भगवान श्री कृष्ण ने 64 दिनों के अल्प समय में सभी शास्त्रों की शिक्षा अर्जित की थी। 64 दिनों में शिक्षा पूर्ण हो जाने के बाद महर्षि सांदीपनि ने श्रीकृष्ण से कहा, 'मेरे पास जो भी ज्ञान था वो तो में आपको दे चुका हुं, आपकी शिक्षा पूर्ण होती है'।

उज्जैन स्थित संदीपन आश्रम में जहां गुरु सांदीपनि बैठते थे वहां उनकी प्रतिमा और चरण पादुकाएं स्थापित है। आश्रम में ही कुंडेश्वर महादेव का मंदिर है जो चौरासी महादेव में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यह पूरी पृथ्वी पर एक ही ऐसा शिवलिंग है जिसमें शिव का वाहन नंदी खड़ा हुआ है।

मान्यता के अनुसार जब श्री कृष्ण आश्रम में आये तो उज्जैन यानी अवंतिका के राजा महाकाल कार्तिक मास की बैकुंठ चतुर्दशी के दिन उनसे मिलने पधारे। तब गुरु के सम्मान में नंदी खड़े हो गए क्योंकि यह गुरु का स्थान है। प्रत्येक बैकुंठ चौदस को यहां हरिहर मिलन के रूप में मनाया जाता है।

Posted By: Amit

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