ग्रहण एक खगोलीय घटना है, जिसके अंतर्गत ग्रह व उपग्रहों के सानिध्य से प्रकाश में अवरोध उत्पन्न होता है। यानी उपग्रहों के कारण किसी ग्रह या स्थान पर प्रकाश का अवरोध हो जाना। हम जानते ही हैं कि पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के परस्पर मेल से या तीनों ग्रह की एक सीध में आ जाने से ग्रहण की स्थिति बनती है। इंदौर के ज्योतिषाचार्य पंडित गिरीश व्यास ने बताया कि जब पृथ्वी और सूर्य के मध्य में चंद्रमा आते हैं, तो सूर्य ग्रहण होता है। जब चंद्रमा और सूर्य के मध्य यदि पृथ्वी आ जाए, तो चंद्र ग्रहण की स्थिति बन जाती है।

अब आप देखिए जब सूर्य और चंद्र साथ में होंगे उस दिन अमावस्या होती है। यानी अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण लगता है और जब सूर्य के सामने चंद्र होते हैं, तब पूर्णिमा होती है अर्थात पूर्णिमा के दिन या पूर्णिमा के समाप्ति काल पर चंद्र ग्रहण होता है। इस ग्रहण में आप को खासा ध्यान भारत में रखने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु किसी भी ग्रहण की कुछ मर्यादा होती है।

ग्रहण में तंत्र-मंत्र का पुरश्चरण, नए मंत्र की सिद्धि, तर्पण, श्राद्ध, जप, हवन इत्यादि किया जाता है। ग्रहण काल से पहले स्नान करें, ग्रहण के मध्य मानसिक देव पूजन, जप, तप, श्राद्ध तर्पण तथा उसके समाप्ति काल में किसी तीर्थ स्थान या नदी तालाब सरोवर या घर में ही स्वच्छ पानी से स्नान करें। इसके बाद ही आप मूर्ति को स्पर्श करें। ग्रहण के दौरान भोजन आदि करना निषेध है। रात्रि काल में तथा जिन ग्रहण राशि वालों को अशुभ फलदायक है, उन्हें ग्रहण नहीं देखना चाहिए या उसके प्रभाव से दूर रहना चाहिए, यह उनके लिए श्रेयस्कर है।

जिन राशियों पर इसका अधिक प्रभाव नकारात्मक रूप से पढ़ रहा है, वे गोदान हवन, वस्त्र दान इत्यादि कर सकते हैं। जहां-जहां ग्रहण दिखाई देता है, वहीं इसकी मान्यता होती है तथा जहां दिखाई नहीं देता है, वहां उसकी मान्यता नहीं माननी चाहिए। अर्थात वहां पर किसी प्रकार का सूतक सिद्ध नहीं होता।

Posted By: Shashank Shekhar Bajpai

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Ram Mandir Bhumi Pujan
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