रामायण के खलनायक रावण ने अपने ज्ञान को रावण संहिता में समाहित किया है। कहते हैं कि त्रेतायुग में यदि कोई सबसे बड़ा विद्वान था तो वह था रावण लेकिन रावण को उसके अहंकार ने नष्ट कर दिया। रावण लंका का राजा था, यह लंका ही वर्तमान में श्रीलंका है। उसके 10 सिर थे। इसीलिए रावण को दशानन के नाम से भी संबोधित किया जाता है। पद्मपुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, कूर्मपुराण, रामायण, महाभारत, आनन्द रामायण, दशावतारचरित आदि हिंदू पौराणिकग्रंथों में रावण के बारे में विस्तार से उल्लेख किया गया है।

रावण अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। वह अपने जीवन में बहुत कुछ ऐसा करना चाहता था कि लोग उसे युगों-युगों तक याद रखें। इस बारे में विस्तार से उल्लेख रावण द्वारा रचित ग्रंथ रावण-संहित में मिलता है।

रावण की महत्वाकांक्षा

संसार में ईश्वर की पूजा नहीं बल्कि रावण की पूजा की जाए। मोक्ष के लिए लोग भटकें नहीं बल्कि वो स्वर्ग तक सीढ़ियां बनवाना चाहता था। सोने की लंका में रहने वाला रावण सोने को सुगंधित बनाना चाहता था।

शराब से दुर्गंध न आए इसलिए वह मदिरा की दुर्गंध हमेशा के लिए मिटाना चाहता था। वह मनुष्य का रक्त लाल से सफेद करना चाहता था। इसके अलावा रावण सातों समुद्रों के जल को नमकीन से मीठा बनाना चाहता था।

इसीलिए पूरी नहीं हुई महत्वाकांक्षा

रावण की महत्वाकांक्षा नकारात्मक थी। उसकी हर चाहत प्रकृति के नियमों को चुनौती देने वाली थी। प्रकृति कभी नहीं चाहेगी कि कोई भी उसके कार्यों में हस्तक्षेप करे। रावण स्वयं ईश्वर बनना चाहता था। वह अहंकार के कारण ऐसा करना चाहता था। उसकी हर महत्वकांक्षा नकारात्मक थी।

अहंकार के कारण उसकी बुद्धि और ज्ञान दोनों ही भ्रमित हो चुका था। यही कारण था कि उसके मन में ऐसी ही महत्वाकांक्षाओं ने जन्म लिया। लेकिन यह महत्वकांक्षाएं वह कभी पूरी नहीं कर पाया।

Posted By: Amit

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